जब शब्द थक जाते हैं
और दुनिया सवाल बन जाती है,
तब एकांत की खिड़की से
हवा भीतर आती है।
यहाँ न कोई दिखावा होता है,
न चेहरे पर बोझिल हँसी,
मन अपने ही सामने
रख देता है हर कमी।
खामोशी बोलती है धीरे,
पर बातें गहरी होती हैं,
भीड़ में जो दब जाती हैं
वे यहीं पूरी होती हैं।
बीते कल की परछाइयाँ
डर बनकर नहीं आतीं,
वे बैठती हैं पास में
और चुपचाप समझ जाती हैं।
यह सुकून अकेलापन नहीं,
यह खुद से मिलने की राह है,
जहाँ टूटे हुए इंसान को
फिर से खुद पर चाह है।
यहाँ वक़्त भी थम-सा जाता है,
साँसें साफ़ लगती हैं,
मन की गहराई में
नई रोशनियाँ जगती हैं।
एकांत में हार नहीं होती,
यह भीतर की तैयारी है,
ताकि शोर में लौटकर भी
रूह मज़बूत और भारी है।
नाम-पल्लवी पटले
जिला-सिवनी, मध्यप्रदेश












