
सुंदर, सरल, सहज, श्रेष्ठ कृति है,
प्रशंसा में एक पाठक ने कह दिया,
यह मात्र संयोग प्रशंसा का है या,
यूँ ही खुश करने हेतु ही कह दिया।
शान्त मन मस्तिष्क से सोचता हूँ,
क्या आलोचना प्रशंसा योग्य हूँ,
क्या ध्यान कोई इतना देता भी है,
मेरी रचनाएँ क्या कोई पढ़ता भी है।
पाठक के मन की बात जान लेना,
रचनाओं में इसका ध्यान रखना,
कविता, कहानी हो या लेख हो,
सुधी पाठकों के पसन्द की हो।
कवि, लेखक व कहानीकार की,
यही हार्दिक अभिलाषा होती है,
पाठक कृतियों को पढ़े, समझे,
तभी कोई रचना सार्थक होती है।
आदित्य यही सरल, सहज, सुंदर
और श्रेष्ठता की पहचान होती है,
निज मन की सोच और कल्पना,
तभी रचना रूप में सार्थक होती है।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ












