
ईश्वर की कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद से अब तक मेरे नौ काव्य-संग्रह; “आदित्यायन”, “आदित्यायन–अनुभूति”, “आदित्यायन–संकल्प”, “आदित्यायन–अभिलाषा”, “आदित्यायन–सृजन”, “आदित्यायन–भुवन राममय”, “आदित्यायन–अमृतकाल”, “आदित्यायन–वतन से प्यार जो करते” तथा आदित्यायन-पूण्य भारी पड़ रहा है” प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त दो लेख–संग्रह; “आदित्यायन-सुभाषितम्” और “आदित्यायन-जीवन अमृत” भी पाठकों के मध्य अपना स्थान बना चुके हैं।
अन्य कृतियाँ “आदित्यायन-प्रेरणा”, “आदित्यायन-आज़ादी का अमृत महोत्सव”, आदित्यायन-प्रभु की कृपा भयउ सब काजू” आदित्यायन-जीवन चक्र”मेरे साहित्य सृजन की पुस्तक संग्रह के रूप में प्रकाशन हेतु तैयार हैं। जो मेरी पन्द्रह पुस्तकों की आदित्ययन शृंखला की कड़ियाँ हैं।
जीवन वृत्तान्त लिखने का भाव मन की उस रचनात्मक व्याप्ति तक पहुँचाता है, जिसकी बीज रूप रचना मेरे बाल्यकाल में ही पड़ चुकी थी। गाँव के प्राथमिक एवं जूनियर विद्यालय में अध्ययन के दौरान मैं प्रायः प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता था। अनुशासनप्रिय, विनम्र और अध्ययनशील विद्यार्थी के रूप में मुझे प्रधानाचार्य तथा समस्त शिक्षकों का विशेष स्नेह प्राप्त था।
मेरे श्रद्धेय पिता स्व. गंगा सेवक मिश्र जी एक परिश्रमशील कृषक एवं धर्मनिष्ठ ब्राह्मण की कर्मनिष्ठा, बड़े भाई का स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन, दादी और माँ का वात्सल्य तथा बड़ी बहनों की आत्मीयता; इन सभी ने ‘आदित्य’ के व्यक्तित्व-निर्माण और जीवन-विकास में अमूल्य योगदान दिया।
कतिपय इन्हीं प्रेरणाओं ने मेरे भीतर लेखन अभिरुचि का अंकुर प्रस्फुटित किया। सातवीं कक्षा तक आते आते मैं पूर्व माध्यमिक विद्यालय का जनरल मॉनिटर तथा साप्ताहिक बाल सभा का प्रमुख वक्ता बन चुका था। आठवीं कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर कानपुर के बी.एन.एस.डी. कॉलेज में प्रवेश लिया, परंतु शहरी विद्यार्थियों के बीच प्रतियोगिता में स्वयं को अपर्याप्त पाकर पुनः गाँव लौट आया और स्थानीय इंटर कॉलेज में अध्ययन करते हुए पुनः शिक्षकों का प्रिय विद्यार्थी बन गया और मैट्रिकुलेशन प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।
इसके बाद का जीवन अनेक मोड़ों से होकर गुज़रा,
मारवाड़ी कॉलेज से इंटरमीडिएट, बी.एस.सी. (पी.सी.एम.) का संघर्षपूर्ण अध्ययन, विज्ञान एवं गणित के शिक्षक के रूप में सेवा, एक निजी विद्यालय के संस्थापक सदस्य और अवैतनिक शिक्षक के रूप में लम्बी अवधि, लखनऊ में एक्स-रे टेक्नीशियन का प्रशिक्षण, सहारनपुर के डाक तार प्रशिक्षण केंद्र में ‘डाक सहायक’ के रूप में उत्कर्ष, जहाँ पाँच में से तीन श्रेष्ठ प्रशिक्षार्थी पुरस्कार प्राप्त किए।
फिर मध्यप्रदेश सर्कल में चयन, उज्जैन आर.एस. पोस्ट ऑफिस में एक वर्ष की सेवा और तत्पश्चात् सेना डाक सेवा में वारंट अफसर के रूप में प्रतिनियुक्ति। कठिन सैनिक प्रशिक्षण के पश्चात् गुवाहाटी से आरम्भ हुआ 36 वर्ष 7 माह 16 दिन का मेरा दीर्घ सैनिक जीवन अनेक अनुभवों से सम्पन्न रहा। इसी दौरान (1985–87) सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश से स्नातक व स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्रथम श्रेणी में, नॉन–कॉलेजिएट अभ्यर्थी के रूप में अर्जित कीं। पचास वर्ष की आयु में सेना सेवा के साथ ही ADP (SAP) कंप्यूटर कोर्स पूर्ण कर ‘अल्फ़ा प्लस’ ग्रेड प्राप्त किया।
अंततः भारत के विभिन्न भागों में वर्षों की सेवा के बाद, मैं 31 जुलाई 2009 को लेफ़्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुआ।
सैनिक जीवन कठोर अनुशासन, नीतियों, शारीरिक क्षमता, निरंतर स्थानांतरण और परिवार से दूर रहने जैसी परिस्थितियों से भरा होता है। परंतु इन्हीं परिस्थितियों के मध्य मैंने गांधीवादी विचारधारा, राष्ट्रवादी भावना और साहित्य सृजन की परंपरा को निरंतर बनाए रखा। कविताएँ, कहानियाँ तथा विचार श्रृंखलाएँ लिखना मेरे लिए जीवन साधना बन गया।
मेरी पुस्तक “आदित्यायन–सुभाषितम्” में मेरे वे विचार संग्रहीत हैं जिन्हें मैं वर्षों से हिंदी, अंग्रेज़ी और संस्कृत में सोशल मीडिया के माध्यम से साझा करता आया हूँ। परिवार, समाज और विशेषकर युवा पीढ़ी तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता की थाती पहुँचाने तथा उसे संरक्षित रखने का भाव मेरे समस्त लेखन का मूल उद्देश्य रहा है।
जीवन के छियत्तरवें पड़ाव पर कैंसर जैसी कठिन बीमारी से सत्रह वर्ष बाद दूसरी बार जूझते हुए भी सृजनशीलता का यह प्रवाह अबाध बना हुआ है। तीन मानद डॉक्टरेट उपाधियाँ, काशी हिंदी विद्यापीठ की ‘विद्या वाचस्पति’ तथा साहित्य रत्न की उपाधियाँ एवं साहित्य, समाज व धर्म-क्षेत्र से प्राप्त छ: सौ से अधिक सम्मान; ये सभी मेरे लिए अमूल्य धरोहर हैं। आज सतहत्तर वर्ष की आयु पूरी करके भी सृजन सरिता उसी वेग से प्रवाहित है।
परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों की इच्छा थी कि मेरी समस्त कविताएँ संग्रह–रूप में उपलब्ध हों। “आदित्यायन” श्रृंखला के अनेक काव्य–संग्रह और लेख/ विचार–संग्रह इसी सामूहिक आकांक्षा और मेरे अनवरत अध्ययन व साधना का प्रतिफल हैं।
मैं जीवन का एक मूल मंत्र सदैव अपने मन-मस्तिष्क में रखता हूँ;
“मानव जीवन ईश्वर की अनुपम देन है। इसे लक्ष्य निर्धारण, निरंतर अभ्यास और सतत अध्ययन के माध्यम से सार्थक बनाया जा सकता है।”
जीवन वृत्तान्त का समापन करते हुए मैं उन सभी गुरुजनों, परिजनों और प्रिय मित्रों का सहृदय आभार व्यक्त करता हूँ, जिनकी प्रेरणा, प्रोत्साहन और सहयोग ने मुझे इस योग्य बनाया है कि मेरे पंद्रह पुस्तक संग्रह साकार हो सके हैं और छ: सौ से अधिक सम्मान पत्र, प्रशस्ति पत्र प्राप्त हो सके हैं।
जय हिंद, जय भारत, जय हिंद की सेना।
विद्यावाचस्पति डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
‘साहित्य रत्न’, लखनऊ (उ.प्र.), भारत












