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माँ की ममता

जन्नत को मैंने देखा नहीं, हाँ माँ की सूरत देखा है।
ईश्वर को मैंने देखा नहीं, हाँ मूरत उनकी देखा है।

जब तपती धूप में ठंडी सी, वह छाँव किनारा बनती थी।
मेरे कदम जब डगर से हटते, तो वही सहारा बनती थी।

मेरे दुख के काँटें को वह हँसकर, आँचल में समेट लिया।
मेरे गमों को मुस्कान से, वह खुद के गमों में लपेट लिया।

माँ के लोरियों की मधुर मिठास, हर हाट मिठाई फीकी लगे।
माँ के हाथ की सिकी रोटियाँ, वह प्रेम बिना सब फीकी लगे।

माँ की ममता की छाँव में, मैं धीरे-धीरे पला बड़ा हुआ।
घुटनों से रेंगते मन्द मन्द, नाजुक पैरों पर खड़ा हुआ।

लोग मन्दिर मस्जित में ईश्वर की, पूजा करने जाते हैं।
हम तो सारा दुनिया का सुख, माँ के चरणों में पाते हैं।

माँ के लिए हर दिन उनका, हर पल उनका, ये जीवन उनका दान है।
आँचल का तेरा छाँव किनारा प्यार तुम्हारा, माँ की ममता ही महान है।

( माँ व गुरु माँ को समर्पित)

नाम – शिव शंकर यादव, शोधछात्र, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषा विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी, उत्तर प्रदेश।(मुख्य परिसर)

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