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जिज्ञासा

सब कुछ तेरा, कुछ नहीं मेरा,
मन क्यों भटके देख सबेरा।
रंग बिरंगी इस दुनिया का,
तु ही तो बस एक रचयिता।

अंग अंग में रंग बसा है,
मन का मालिक तन का दाता।
पंचतत्व को एक बनाकर ,
तुने ही तो सब को रचा है।

सांसों को तुम ने गति दी है,
पानी से है खून बनाया।
सब कुछ तेरा ,कुछ नहीं मेरा,
मन क्यों भटके देख सबेरा।

आंखों को दे कर के ज्योति ,
खारे जल को कमल दीया है।
हृदय वेदना जब- जब उठती,
सागर उफने बिखरे मोती।

सब कुछ अच्छा करते हुए,
क्यों मन को बेलगाम किया है।
सब का सपना अपना अपना,
पुर्ण करे तु दे कर कल्पना।

तिज त्योहारों की दे क्यारी,
गगन सदृश्य विस्तार दिया है।
सब कुछ तेरा कुछ नहीं मेरा,
मन क्यों भटके देख सबेरा।

कमल

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