
“परछाइयाँ जिन्हें दबा दिया गया था—
अब वे अंजना को पुकार रही थीं।”
बाहर उठी वह खुरदरी आवाज़
कुछ पल तक हवा में अटकी रही—
जैसे अँधेरे ने
साँस ली हो।
देवकीनंदन और अंजना
दोनों जड़ हो गए।
न डर ने उन्हें पकड़ा था,
न साहस ने—
बल्कि उस क्षण ने,
जो अक्सर
सच के ठीक पहले
ठहर जाता है।
अंजना ने धीरे से पूछा,
“यह… यह आवाज़ किसकी थी?”
देवकीनंदन का गला सूख गया।
“वही, बिटिया…
जिनका नाम
हमने अभी लिया था।
परछाइयाँ
जब अपना ज़िक्र सुन लेती हैं,
तो चुप नहीं रहतीं।”
लालटेन की लौ काँप उठी।
दीवारों पर परछाइयाँ
लचककर लंबी हो गईं—
मानो वे सिर्फ़ दीवारों पर नहीं,
अंजना के भीतर भी
उतरना चाहती हों।
- बाबा की अधूरी लड़ाई
“बाबा की अधूरी लड़ाई
अब तुम्हारे नाम लिखी जा रही है।”
देवकीनंदन की नज़र
दरवाज़े पर टिक गई।
उसकी आँखों में वही डर था—
जो सालों तक
दफ़न सच ढोने वालों की
आँखों में होता है।
“बिटिया…
तू समझ नहीं रही।
तेरे बाबा का पाप मरा नहीं है।
जिसे वह पूरी तरह रोक न सके—
वही अब
तेरे पीछे है।”
अंजना का दिल
तेज़ धड़कने लगा।
“कौन लोग?”
उसने हिम्मत जुटाकर पूछा।
देवकीनंदन के होंठ हिले,
पर आवाज़ नहीं निकली।
फिर बहुत धीरे बोला—
“वही…
जिन्हें उन्होंने रोका था,
और कुछ…
जिन्होंने रोकने की
हिम्मत भी नहीं जुटाई।” - हवेली के बाहर
अचानक बाहर
सूखे पत्तों पर
किसी के पैरों की
घिसटती आहट सुनाई दी।
देवकीनंदन ने
लालटेन कसकर पकड़ ली।
“यह हवा नहीं है,”
वह फुसफुसाया।
“आज रात
जो चल रहा है,
वह इंसानों की चाल नहीं है।”
दरवाज़े के बाहर
छाया गाढ़ी हो चुकी थी—
स्थिर, भारी,
जैसे इंतज़ार कर रही हो।
अंजना ने डर को निगलते हुए पूछा,
“अगर ये बाबा की परछाइयाँ हैं,
तो मुझसे क्या चाहती हैं?”
देवकीनंदन ने
लंबी साँस ली।
“तेरी माँ का सच…
जिसे उन्होंने छुपा लिया था।
और जो अब
तुझसे पूरा होना चाहता है।” - माँ का सच
“तुम्हारी माँ ने भी
एक सच छुपाया था, बिटिया।”
अंजना का शरीर
जैसे ठंडा पड़ गया।
“माँ…?”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“उन्होंने क्या छुपाया था?”
देवकीनंदन ने
नज़र झुका ली।
“जिस रात
तेरे बाबा ने खून किया,
उस रात
तेरी माँ ने
पूरी बात नहीं बताई।”
अंजना का दिल
डूबने लगा।
“जो चार लोग
उन्हें उठाने आए थे—
उनमें से एक…
पुराना जान-पहचान वाला था।”
“पहचान वाला… मतलब?”
उसके पैरों तले
ज़मीन खिसक गई।
देवकीनंदन की आवाज़
भारी हो गई।
“वह लड़का
उन्हें चाहता था।
और तेरी माँ…
कभी-कभी
उससे बात भी करती थी।” - अधूरा सच
“तेरी माँ ने
यह बात बाबा को नहीं बताई,”
देवकीनंदन बोला।
“उसे डर था—
अगर सच सामने आया,
तो बाबा
किसी को नहीं छोड़ेंगे।”
अंजना रो पड़ी।
“तो वह खून…
गलतफ़हमी थी?”
देवकीनंदन ने
धीरे से सिर हिलाया।
“सिर्फ़ गलतफ़हमी नहीं, बिटिया—
अधूरा सच।
और अधूरा सच
अक्सर पूरा पाप बन जाता है।” - परछाइयाँ और पास
परछाइयाँ
और क़रीब आ गईं।
लकड़ी के पास
हल्की-सी सरसराहट हुई—
जैसे कोई
नाख़ूनों से
पुरानी लकड़ी को
कुरेद रहा हो।
देवकीनंदन की आवाज़
काँप उठी।
“ये आज रात
रुकेंगी नहीं।”
अंजना उठ खड़ी हुई।
डरी हुई थी—
पर झुकी नहीं।
उसने लकड़ी की ओर
सीधे देखते हुए कहा,
“अगर पाप बाबा का था,
तो सच मेरा होगा।”
हवा अचानक
थम गई।
परछाइयाँ
जैसे सुनने लगीं। - सच की राह
“इस रास्ते से
वापस नहीं लौटा जाता, बिटिया,”
देवकीनंदन
लगभग गिड़गिड़ा पड़ा।
“सच की राह
सुंदर लगती है,
पर सबसे ज़्यादा
ख़तरनाक होती है।”
अंजना रुकी नहीं।
उसकी आवाज़ में
अब डर नहीं,
फ़ैसला था।
“मैं लौटने के लिए
नहीं जा रही, दादा।
मैं जानने जा रही हूँ—
कि बाबा का पाप
और माँ का झूठ
किसने
और क्यों
छुपाया।”
परछाइयाँ
जैसे उसका रास्ता
छोड़ने लगीं।
देवकीनंदन की
आख़िरी चेतावनी
हवा में गूँज उठी—
“सच
मरे हुए लोगों से नहीं,
ज़िंदा लोगों से
भरा होता है।
और वही
सबसे ज़्यादा
ख़तरनाक होते हैं।”
अंजना ठहरी।
फिर बोली—
“तो मैं
उन्हीं से
मिलूँगी।”
लालटेन की लौ
एक पल को
तेज़ हुई—
फिर धीमी पड़ गई।
और बाहर…
परछाइयाँ हिलीं,
जैसे
बहुत पुराना हिसाब
अब
चुकने वाला हो।
आर एस लॉस्टम












