Uncategorized
Trending

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

अपने कर-कमलों से हमारा भविष्य सुरक्षित करने वाले महान और हमारे आदर्श “नेताजी सुभाष चंद्र बोस” जी को शत्-शत् नमन्

आम तौर पर जब हम “नेताजी सुभाष चंद्र बोस” का नाम लेते हैं, तो हमारे दिमाग में तुरंत कुछ तयशुदा चित्र उभरते हैं—खाकी वर्दी, टोपी, तेज चाल, और नारा “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।” लेकिन क्या सुभाष को सिर्फ़ इन तस्वीरों में कैद करके समझा जा सकता है? क्या वे केवल एक सैन्य वर्दी, एक रैली, या आज़ादी की पुकार भर थे?
असल में सुभाष चंद्र बोस एक सवाल थे—अपने समय से, अंग्रेज़ों से, यहाँ तक कि अपने ही नेताओं से। यह आलेख उसी सवाल की खोज है।
वह लड़का जो आदेश नहीं, अंतरात्मा सुनता था।
कटक के सभ्य, पढ़े-लिखे परिवार में जन्मा एक बालक—कंधे पर बस्ता, आँखों में सवाल। स्कूली किताबों में उसे अनुशासित छात्र के रूप में दिखाया जाता है, पर कल्पना कीजिए, कोई ऐसा बच्चा जो अपने अध्यापक से पूछ ले—
“अगर किसी का देश ग़ुलाम हो, तो क्या सिर्फ़ अच्छे नंबर लाना ही कर्तव्य है?”
यही सुभाष थे।
वे नियमों के ख़िलाफ़ नहीं थे, मगर अन्यायपूर्ण नियमों के लिए चुप रहना उन्हें मंज़ूर नहीं था। बचपन से ही उनके भीतर एक अजीब द्वंद्व था—
एक ओर संस्कारी, अनुशासित बेटा
दूसरी ओर भीतर से बेचैन विद्रोही, जिसे हर ग़लत बात चुभती थी। यही द्वंद्व आगे चलकर उन्हें सामान्य नेता से अलग बनाता है।
ब्रितानी राज में आई.सी.एस. (आज की आई.ए.एस. से भी अधिक प्रतिष्ठित सेवा) मिलना मानो जीवन की सबसे बड़ी जीत थी। माता-पिता, समाज, रिश्तेदार—सब चाहते थे कि बेटा ऊँचे ओहदे पर पहुँचे, आरामदायक जीवन जिए, सरकारी बंगला, गाड़ी, सम्मान…
सुभाष ने यह सब पाया भी। लेकिन फिर उन्होंने ऐसे महान काम किए, जो आज भी हमें भीतर तक हिला सकते हैं—
उन्होंने तैयार नौकरी पर हस्ताक्षर करने से पहले अपनी अंतरात्मा का हस्ताक्षर देखा।
उन्हें लगा, “जो सत्ता मेरे देश को कुचल रही है, उसके लिए काम कैसे करूँ?”
उन्होंने वह मौका छोड़ दिया, जिससे अधिकांश लोग अपनी ज़िंदगी “सेट” कर लेते हैं।
यह निर्णय केवल एक राजनीतिक कदम नहीं था; यह एक मूल्य-घोषणा थी—
“सम्मान की रोटी, सुविधा की थाली से अधिक मीठी होती है।”
अंत में ऐसे जाँबाज़ सिपाही के लिए इतना ही कहते हुए मैं निज शब्दों को विराम देती हूँ कि-
सोच की प्रयोगशाला से जिन्होंने भारत देश आज़ाद करवाया।
सुख-सुविधाओं का त्याग कर केवल सुकर्मों को गले लगाया।।
भविष्य के भारत देश की रीढ़ बनकर ही निज जीवन बिताया।
ऐसी महान शख्सियत से मैंने भी आप सभी को मिलवाया।।

जय हिंद, जय भारत

अपनी महान और विशेष विभूतियों से प्रत्येक पल प्रेरित, चित्त से केवल हित की बात कहने वाली-
लेखिका-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *