
आया है फिर बसंत, नई धुन सुनाने को,
कलियों ने होंठ खोले हैं, अब मुस्कुराने को।
छाई है हर तरफ़ ये, सुनहरी सी रौशनी,
सरसों भी सज गई है, धानी सजाने को।
बागों में तितलियों के परों पर गुलाल है,
मौसम भी बेकरार है, सबको रिझाने को।
माँ शारदे के चरणों में, झुकता है सारा जग,
अज्ञानता के सब वो, अँधेरे मिटाने को।
वीणा की वो झंकार, हवाओं में घुल गई,
साहित्य और सुरों का, नया घर बसाने को।
आया है फिर बसंत, नई धुन सुनाने को,
कलियों ने होंठ खोले हैं, अब मुस्कुराने को।
रीना पटले, शिक्षिका
शास.हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश












