
श्रावणी और पावनी दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं। स्कूल के प्रांगण में ही नृत्य की शिक्षिका दोनों को नृत्य सिखाती थीं। श्रावणी धनी परिवार से थी वहीं पावनी किसी तरह से अपने नृत्य क्लास का फीस भरती थी। स्कूल में वार्षिक समारोह का आयोजन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थी।
पावनी दिन -रात नृत्य का प्रैक्टिस कर रही थी। श्रावणी को अपने नृत्य
पर पूरा घमंड था, कि मेरे जैसा कोई नृत्य नहीं कर सकता, क्यों करूं मैं प्रैक्टिस। समारोह में नित्य प्रतियोगिता में सहभागिता के लिए श्रावणी और पावनी को मंच पर आमंत्रित किया गया। दोनों ने अपना नृत्य प्रदर्शित किया। अब बारी थी निर्णय की, निर्णायक ने प्रथम पुरस्कार पावनी को मंच पर बुलाकर दिया। सभी उसके नृत्य की सराहना करते रहे।
श्रावणी और पावनी एक साथ घर लौट रही थी। क्या जमाना आ गया है…. झूठी प्रशंसा करके पुरस्कार दे रहे हैं। ये पुरस्कार किस काम का…
यह भी कोई पुरस्कार है। इससे तो अच्छे-अच्छे समान मेरे पास हैं।
सच ही कहा गया है कि”अंगूर खट्टे हैं”
डॉ मीना कुमारी परिहार












