
रात का तीसरा पहर—
वह समय जब पूरा गाँव सोता नहीं,
बस चुप हो जाता है।
इस चुप्पी में अँधेरा
साँस लेता हुआ लगता है,
और परछाइयाँ
अपने ही आकार से काँपने लगती हैं।
मिहार की वही रात थी।
हवा में हल्की ठंडक थी—
लेकिन यह ठंडक मौसम की नहीं थी।
यह आने वाले तूफ़ान का
खामोश इंतज़ार थी।
जिसे हर जीव—
गाय, कुत्ता, बूढ़ा, पेड़,
यहाँ तक कि मिट्टी भी—
अपनी-अपनी तरह से महसूस कर रही थी।
- सरगमी की दबी चीख
सरगमी को नींद नहीं आ रही थी।
हर बार जब वह आँखें बंद करती,
वही दृश्य सामने आ जाता—
रात में बुझता हुआ लालटेन,
और किसी के गले में अटकी
आधी चीख।
वह उठी और आँगन में चली गई।
आँगन में खड़े आम के पेड़ से
पत्ते गिर नहीं रहे थे—
वे उतर रहे थे,
जैसे किसी ने उन्हें नीचे आने का
इशारा किया हो।
हवा में एक अजीब-सी कंपन थी।
“बाबूजी…?”
उसने धीरे से पुकारा।
जवाब में केवल हवा ने
पत्तों को उड़ा दिया—
मानो कह रही हो:
“बोलो मत… कोई सुन रहा है।” - चंदभान की दुविधा
इसी बीच चंदभान
अपने कमरे में बैठा था।
वह अगली सुबह की रणनीति
सोच रहा था।
मिहार में कुछ बहुत बड़ा
बदलने वाला था—
लेकिन बदलने से पहले
सब कुछ टूटना तय था।
वह सोच रहा था—
“अगर आज पीछे हटा,
तो आने वाली पीढ़ियाँ
मेरा नाम भी याद नहीं रखेंगी।
और अगर आगे बढ़ा,
तो शायद यही नाम
मेरा बोझ बन जाएगा।”
अचानक कमरे के बाहर
दो धीमी फुसफुसाहटें उभरीं—
“सब लोग तैयार हैं?”
“हाँ… बस इशारे का इंतज़ार है।”
चंदभान की गर्दन की नसें
तन गईं।
किसका इशारा?
किसके लिए तैयारी?
क्या उसकी पीठ पर
किसी ने चुपचाप
निशाना तो नहीं लगा दिया? - जुना का रहस्य
गाँव से बाहर,
पुराने कुएँ के पास—
जहाँ लोग दिन ढलने के बाद
जाना पसंद नहीं करते—
जुना गड्ढा खोद रहा था।
चेहरा पसीने से भीगा था,
पर हाथों में कंपन नहीं था।
गड्ढा भर जाने पर
उसे उसमें से
पुरानी लोहे की ज़ंजीर
और खून लगी लकड़ी की मुठ
मिली।
वही मुठ—
जो सालों पहले
नरसंहार की रात
गायब हुई थी।
दूर से किसी परछाईं की
हलचल दिखी।
जुना ने जल्दी से
गड्ढा मिट्टी से भर दिया।
परछाईं उसके पास आई
और ठहर गई।
जुना बोला,
“सबूत मिटा दिए…
पर यादें?”
परछाईं ने सिर्फ इतना कहा—
“यादें ही तो
सबसे बड़ा सबूत बनती हैं, जुना।”
और वह अँधेरे में
गायब हो गई। - रूणी की दहलीज़ पर पड़ा खत
रूणी ने दरवाज़े के नीचे
एक मुड़ा हुआ काग़ज़ देखा।
न कोई दस्तख़त,
न कोई निशान।
बस एक पंक्ति—
“जब सच बाहर आएगा,
तो मिहार की मिट्टी
खामोश नहीं रहेगी।”
उसके हाथ काँप गए।
काग़ज़ के नीचे
लाल धूल लगी थी—
वही धूल
जो मिहार के दक्षिणी मैदान से आती है,
जहाँ कभी सूरज ढलते ही
कुहासा नहीं,
धुआँ उठता है। - रात की आख़िरी फुसफुसाहट
रात अब पूरी तरह
गहरी हो चुकी थी।
पत्तों की सरसराहट
धीमी पड़ गई।
फिर भी एक फुसफुसाहट—
बहुत हल्की,
बहुत दूर से—
मिहार की हवा में
तैर रही थी—
“अगली सुबह…
कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।”
किसने कहा?
कहाँ से आई?
किसके लिए थी?
किसी को नहीं पता।
लेकिन सबने सुनी—
ज़रूर सुनी।
आर एस लॉस्टम












