
वह सिर्फ़ पास आकर ठहर गई—इतना किया,
मेरे भीतर की हर हलचल को शांत किया।
उसके मौन ने सिखाया ठहराव का हुनर,
बिना कुछ कहे ही सब बयान किया।
कभी आँखों में रही, कभी ख़यालों में,
प्रेम को उसने कल्पना तक विस्तारित किया।
वह मेरा हो—यह सवाल कभी था ही नहीं,
उसने धड़कनों में उतरकर इज़हार किया।
न कोई हक़ माँगा, न वादों की चाह,
बस महसूस होने भर से काम लिया।
अनकहे शब्दों की गहराई समझी मैंने,
उसके मौन ने ही मुझे मुकम्मल किया।
पाने-खोने से परे जो सच निकला,
प्रेम ने जीवन में उतरना सिखा दिया।
जो न देखा जा सके, न छुआ जाए कभी,
उसने वही कुछ मेरे भीतर रख दिया।
आर एस लॉस्टम












