
गंगा की लहरों ने जिनका नाम पुकारा,
धरती ने जिनको वीर कह सँवारा।
माटी यहाँ केवल मिट्टी नहीं,
हर कण में इतिहास की ज्वाला है कहीं।
जब फिरंगी ने ललकारा स्वाभिमान,
बिहार उठा, बन आँधी, बन तूफ़ान।
जगदीशपुर की धूल ने शपथ उठाई,
“दास नहीं होंगे”—यह हुंकार आई।
अस्सी बसंत देख चुके थे वे,
पर भुजाओं में बिजली समाए थे।
वीर कुँवर सिंह—नाम नहीं, ज्वाला,
जिसने गदर को दिया दिशा का उजाला।
कटे हाथ से भी तलवार उठी,
रणभूमि में मृत्यु भी ठिठकी, रुकी।
आरा, बक्सर, रोहतास की धरती बोली—
“आजादी यूँ ही नहीं मिलती, ओली।”
भाई अमर सिंह ने रण सँभाला,
जब दीप बुझा, तब दीप जला डाला।
हार मिली, पर हार नहीं मानी,
त्याग की गाथा अमर बनानी।
इससे पहले भी इतिहास ने देखा,
मुग़लों से टकराया स्वाभिमान लेखा।
उज्जैनिया राजपूतों की तलवारें,
सत्ता से नहीं—अन्याय से हारीं।
कभी किले टूटे, कभी संधि हुई,
पर चेतना कभी पराजित न हुई।
जो झुके, वे समय की चाल थे,
जो लड़े—वे बिहार की ढाल थे।
फिर बीसवीं सदी की आई पुकार,
कलम बनी तलवार, जेल बना द्वार।
कोई कांग्रेस, कोई क्रांतिकारी,
सबकी साँसों में एक चिंगारी।
नाम बहुतों के किताबों में नहीं,
पर उनकी क़सम धूल में भी सही।
जिनके खून से आज़ादी सींची गई,
उनकी कहानी चुपचाप लिखी गई।
ओ बिहार! तू केवल भूगोल नहीं,
तू वीरों का अनंत संवाद है कहीं।
तेरी गाथा में हार भी जीत है,
तेरा हर बलिदान इतिहास की प्रीत है।
जब भी आज़ादी पर प्रश्न उठे,
गंगा के तट से स्वर यह फूटे—
“हम झुके नहीं, हम टूटे नहीं,
हम बिहार हैं—हम रूठे नहीं।”
आर एस लॉस्टम












