
जिंदगी वह पहेली है
सुख दुःख की सहेली हैं।
बे-तहाशा ठोकरें खाकर,
ख़ुद को तराशने की जिद्द,
आज चढ़ पढ़ी है।
सब-कुछ छोड़ – छाड़ने के बाद,
अब खुद से ही मेरी,
मुलाकात होने लगी है।
जमाने के दिल को,चीरते तंज से,
खुद को बचाते हुए,
अपने हुनर के तरकश से,
खुद को नए सिरे से,
तराशने की जिद्द ,आज चढ़ पढ़ी है।
पल-पल फिसलते वक्त को,
मुट्ठी में थामने की,
बेतहाशा कोशिश करने की,
जिद्द में इंसानियत की,
पहचान मुझे होने लगी हैं।
जिंदगी के हर मोड़पर मिले,
हर ठग से, खुद को बचाने की,
नई तालिम मुझे हासिल होने लगी हैं।
अपने और परायों को,
पहचाने के जद्दो-जहद् में,
ख़ुद के भीत्तर छिपी
ताकत से रुब – ब होने की,
फुर्सत आज मुझे, मिलने लगी हैं।
ख़ुद में जो नूर है,
उसे यहाँ – वहां तलाशने के
बजाये,
अपने ही भीत्तर ही देखनी की,
अलामात होने लगी हैं।
डॉ. परवीन शेख
तह. देगलूर जिला. नांदेड़,
महाराष्ट्र।












