
हमने आज़ादी यूँ ही नहीं पाई है,
ये किसी दस्तख़त की रुसवाई है।
ये किसी तारीख़ का जश्न नहीं है,
ये लहू, आँसू और तन्हाई है।
कभी मुग़लों से लड़ीं तलवारें,
कभी सीने ने गोलियाँ खाई है।
कितने शहीद हुए—कौन जाने,
हर साँस में उनकी परछाई है।
कितनी माँओं की गोद सूनी रही,
कितनी आँखों ने नींद गँवाई है।
कितनी बिरांगनाओं का सिंदूर,
वक़्त ने बेरहमी से मिटाई है।
इतिहास ने गिनती नहीं की कभी,
ये लड़ाई नहीं—एक सच्चाई है।
आज पूछते हैं लोग—देश ने क्या दिया?
देश ने यादों की ज़िम्मेदारी सौंपी है।
माँ से पूछो आज़ादी का मतलब,
जिसने बेटे की तस्वीर सजाई है।
बच्चों से पूछो जो बात करते हैं,
उस फ्रेम से जो दीवार से लगाई है।
आज भी ज़ख़्मों को ढोती हैं आँखें,
आज भी साँसों में रुकावट आई है।
आज़ादी कोई आराम नहीं होती,
ये हर पीढ़ी की आज़माई है।
जो कहते हैं हम आज़ाद नहीं,
उन्होंने विरासत नहीं निभाई है।
ये मुल्क काग़ज़ से नहीं बना ‘दोस्त’,
ये शहीदों की हड्डियों से उगाई है।
आर एस लॉस्टम












