
पंचायत की तैयारी जहाँ खुले मैदान में हो रही थी,
वहीं गाँव के छोर पर खड़ी पुरानी हवेली के भीतर
कुछ और ही उबाल पक रहा था।
वह हवेली—
जिसकी टूटी खिड़कियाँ हवा के साथ कराहती थीं,
जिसके बरामदे में जालों से ढकी लालटेन लटकी रहती थी,
और जिसकी दीवारों पर अनकहे अपराधों की छाप
आज भी ज़िंदा थी।
उस हवेली के भीतर
बिहार के असली अँधेरे जमे हुए थे।
- बलदेव सिंह की बंद होती हवेली
हवेली के बड़े कमरे में
बलदेव सिंह चारपाई पर बैठा था।
कमज़ोर होता शरीर,
चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ,
और आँखें—
जैसे अंगारों पर जमी ठंडी राख।
सामने लकड़ी की मेज़ पर
एक छोटी लाल फ़ाइल रखी थी।
फ़ाइल पर जमी धूल
बरसों से दबाई गई सच्चाइयों जैसी थी—
छुपी हुई, पर ज़िंदा।
कमरे में उसके बेटे सुरेश
और पुराना सहयोगी जगत सिंह मौजूद थे।
सुरेश गुस्से में बोला—
“बाबू, ये लड़की गाँव को हिला रही है!
आप चुप कैसे बैठे हैं?”
बलदेव ने धीरे से फ़ाइल खोली।
उसकी उँगलियाँ काँपी नहीं।
“जिस आग को हमने लगाया था,”
वह बोला,
“अब उसकी लपटें
हमारे आँगन तक पहुँचने लगी हैं।”
जगत सिंह बेचैन होकर बोला—
“अगर पंचायत में सच सामने आ गया
तो हम सब फँस जाएँगे।”
बलदेव हँसा—
एक ऐसी हँसी
जिसमें खून की गंध थी।
“गाँव का सच
पंचायत से नहीं बदलता,”
वह बोला,
“गाँव का सच
डर से बदलता है।”
सुरेश ने पूछा—
“तो अब क्या करें?”
बलदेव ने फ़ाइल बंद की।
“अंजना को सच बोलने से रोकना होगा…
और अगर वह न रुकी
तो उसे चुप कराना होगा।” - हवेली की छत पर सुनता एक साया
तीनों को पता नहीं था—
हवेली की टूटी छत के पीछे
कोई यह सब सुन रहा था।
वह मव्वी था—
कभी हवेली का आदमी,
पर जिस दिन उसने अंजना
और गाँव का साथ चुना,
उसी दिन वह
इनके लिए काँटा बन गया।
उसने बुदबुदाकर कहा—
“ये लोग पंचायत पर हमला करेंगे…
या अंजना पर।”
दिल तेज़ धड़क रहा था,
पर डर नहीं था—
सिर्फ़ एक फ़ैसला था।
वह चुपचाप नीचे उतरा
और दौड़कर गाँव की ओर निकल गया।
हवेली का अँधेरा
उसके पीछे ऐसे सरक रहा था
जैसे कोई भूखा भेड़िया
शिकार के पीछे हो। - गंगाराम का अशुभ संकेत
उसी समय
गाँव की दूसरी ओर
गंगाराम खेतों से लौट रहा था।
उसकी नज़र अचानक आकाश पर गई—
एक बड़ा काला पक्षी
चक्कर काट रहा था।
गंगाराम बुदबुदाया—
“आज का दिन अशुभ है…
हवा में बुराई की गंध है।”
वह तेज़ी से
पंचायत की ओर बढ़ा। - अंजना का संकल्प
अंजना पंचायत स्थल पर पहुँच चुकी थी।
लोग इकट्ठा हो रहे थे—
पुरुष, महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग।
कुछ की आँखों में उम्मीद थी,
कुछ के मन में डर।
राजन उसके पास आया।
“तैयार हो?”
अंजना ने चारों ओर देखा—
सालों से दबा गाँव,
सच का बोझ उठाए चेहरे।
धीरे से बोली—
“हाँ।
आज बिहार
अपनी टाँगों से नहीं,
अपने पापों से चलेगा।” - मव्वी का आगमन
उसी पल
मव्वी हाँफता हुआ पहुँचा।
“अंजना!
हवेली में बैठे लोग
तुम्हारे ख़िलाफ़ साज़िश कर रहे हैं।
आज पंचायत पर हमला होगा!”
भीड़ में सिहरन दौड़ गई।
राजन गुस्से से बोला—
“बलदेव…!”
गंगाराम भी पहुँच चुका था,
उसकी लाठी कसकर थमी हुई थी।
अंजना ने गहरी साँस ली।
उसकी आँखों में
डर का एक कण भी नहीं था।
“हम डर के कारण
सच कहना नहीं छोड़ेंगे,”
उसने कहा।
फिर ऊँची आवाज़ में बोली—
“आज पंचायत होगी।
और अगर ख़तरा है
तो हम सब साथ खड़े होंगे।”
भीड़ में एक लहर उठी—
हिम्मत की,
डर की,
और उम्मीद की।
तभी
हवेली की ओर से
चार काली मोटरसाइकिलें
तेज़ी से आती दिखाई दीं।
अंजना ने शांत स्वर में कहा—
“तो खेल शुरू हो चुका है।”
आर एस लॉस्टम












