Uncategorized
Trending

एक मुलाकात

हमारे एक मित्र नेक और शरीफ
आए हमारे पास
कहने लगे- -हम पढ़ते हैं नित्य
आप की लिखी
समाज देश और धर्म के लिए कैसे जिएं जिंदगानी।
जिंदादिली पर भी कुछ लिख दो
होगी आप की मेहरबानी।
जिंदगी भर वक्त से लडे
इस आखिरे पायेदान पर लगता है हम खड़े।

करते रहे कर्म और बुजुर्गों की शर्म
भूली बिसरी यादें हमे बहुत करती तंग
दूसरों की पढ़ते रहें शायरी
वो गुजरा जमाना था
शर्म-ओ-हया का था जमाना
डर-डर कर जीते रहे
जिंदगी बन के रह गई अफसाना।
भाई मेरे तुम से क्या छुपाना
वो हो गए आज पूरे
हम अश्कों का अभी-अभी
दे कर आए आखिरी नज़राना।

उन की बातें सुनकर हम हिल गए
ठीक से सो भी न पाए
अपनी लिखी कविता — ‘ हे लता ‘
को रोक लिया हम ने
हमारे द्वार पर ‘मन की बात’ कहने
आए थे हमारे यार
क्या हर्ज था
हो जाता पूरा अगर उन का दिल-ए-इकरार
तब जमाने में
सच पूछो — जीना हो जाता था दुश्वार।

महेश शर्मा, करनाल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *