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स्वचिंतन

स्वचिंतन से हर राह निकलती
कभी तो इसे आजमाया करो

कहानियाँ यूँही न सुनाया करो ,
सुख दुख की बदली ये जीवन

हार मान यूँ, न बैठ जाया करो
कभी खुद से प्यार जताया करो

जब तक कोई , अंतर्मन न छूले
उसे भेद सारे ,न तुम बताया करो ।।

दिल दिमाग से, एकाग्रचित होकर ,
अपनी उलझने खुद सुलझाया करो।

नहीं किसी के विश्वास के ऊपर ही
यूँही न अपना विश्वास जताया करो

जब तक कोई ,मन में न समा जाए
तब तक तुम न मन की बताया करो

ये दुनियाँ का खेल हैं अजब निराला
तुम धोखा न किसी से यूँ खाया करो

खुद को इतना तुम, मजबूत बना लो
हृदय संवेदनाओं से खुद पार पाया करो ।।

©आशी प्रतिभा
मध्य प्रदेश, ग्वालियर
मध्य प्रदेश

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