
कदम जब डगमगाते है मेरे
कुछ सीखने को मिलता है,
दौर है ये अपने पन का
अपना पराया सब समझता है।
बड़ी मुश्किल से ही सही
पर पाया है इक मुकाम को,
इंसान हूं इंसान की
नस – नस को मैं पहचानता हूं।
कवि संगम त्रिपाठी

कदम जब डगमगाते है मेरे
कुछ सीखने को मिलता है,
दौर है ये अपने पन का
अपना पराया सब समझता है।
बड़ी मुश्किल से ही सही
पर पाया है इक मुकाम को,
इंसान हूं इंसान की
नस – नस को मैं पहचानता हूं।
कवि संगम त्रिपाठी
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