
विश्व पृथ्वी दिवस पर आओ, धरती को सँवारें,
सूखी गोद में हरियाली के फिर दीप हम उतारें।
काट-काट वन मानव ने, प्रकृति को नंगा किया,
लोभवश खनिज दोहन कर, जीवन-स्रोत जला दिया।
रोते गिरि, सरिता, तड़ाग सब, पीड़ा अपनी कहते,
“चेतो मानव!” करुण पुकारें, संकट सिर पर रहते।
काँप रही है धरा धीर अब, संतुलन खो बैठी,
असंयम के इस पथ पर चल, मानव बुद्धि भी रुठी।
वायु हुई विष, जल भी दूषित, जीवन कठिन बनाता,
धुंध भरा आकाश देख, हर प्राणी घबराता।
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ, हरियाली फिर लाएँ,
प्रकृति माँ के आँचल को हम, फिर से हरा बनाएँ।
क्रुद्ध हुई यदि प्रकृति कभी तो, संकट घेरेंगे,
रोग, आपदा, तूफान, भूकंप—सब कुछ सहने पड़ेंगे।
शुद्ध रहे जब धरा हमारी, खुशहाली आएगी,
उपवन-सा संसार बनेगा, हरियाली छाएगी।
प्रदूषण के इस अंधकार में, सुख न कहीं मिलेगा,
प्रेम-सहयोग से ही जीवन, पुष्पित फिर खिलेगा।
आओ मिलकर व्रत लें हम सब, प्रकृति संग जीना,
पृथ्वी दिवस का सच्चा अर्थ—हरित धरा को सींचना।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार













