
राकेश आनंदकर
सच को पांच साल का जब वनवास मिला ।
लोग झूठ को सेवा की सियासत कहते चले गये ॥
फर्ज़ की राह पर चलना बड़ा मुश्किल है ए ! दोस्त
बेमतलब लोग मतलब का रास्ता पूछते चले गये ॥
कहने – सुनने का दौर अब कहां रहा माई – बाप ।
धैर्य के सवाल पर बच्चे अवसाद में चले गये ॥
वसीयत में उसने सेवा को धर्म क्या लिखा ।
पढ़ने वाले लोग इसे राजनीति कहते चले गये ॥
गैर के दर्द को उसने अपना किस्सा बताया ।
लोग लतीफा समझ कर फिर हंसते चले गये ॥
बंद मुट्ठी आने वाले से पूछा जब खुले हाथ का सच ।
बोला , कर्म के खेत में पुण्य बोकर धर्मार्थ चले गये ॥
गरीब -लाचारों की आवाज का बाजार है गरम ।
चापलूसों को लोग अब अखबार कहते चले गये ॥
जीवन के उपवन में हमने स्वयं को खोजा ” आनन्दकर “
हमें मन के राम मिले – तन के रावण मरते चले गये ॥













