
उड़ान सपनों की
उड़ रहे है हम,
कभी समस्याएं
हमारी होगी कम।
उंगली में लगी
चुनावी स्याही प्रश्न बन गई,
अपनों के शासन में
जिंदगी सब सह गई।
गैर होते तो शिकायत
किसी से करते,
अपने है इंकलाबी नारा भी
हम नहीं भरते।
पांच साल आशा के
भरोसे काट लेते है,
चुनाव आया जाहिलों को
वोट दे देते है।
कवि संगम त्रिपाठी













