Uncategorized
Trending

प्रेम भक्ति, श्रद्धा, विश्वास और दृढ़ता

जीवन एक अविराम यात्रा है,
इस यात्रा में वही पथिक अपने
गंतव्य तक पहुँच पाता है जो
निरंतर यात्रा में चलता रहता है।

इस यात्रा में पथ, पाथेय और गंतव्य
तीनों के प्रति श्रद्धा अति आवश्यक है,
श्रद्धा पथिक को पथ का अविचल
राही बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

श्रद्धा अपने सद्विचार पर बुद्धि
स्थिर रखने का दूसरा नाम है,
किसी भी जीवन लक्ष्य को पाने
के लिए बहुत से रास्ते होते हैं।

भारतीय आध्यात्मिक भक्ति के नौ
प्रकार श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन
पादसेवन, वंदन, दास्य, सख्य और
आत्मनिवेदन के रूप में बताये जाते हैं।

नवधा भक्ति के नौ रूप ये कहलाते हैं,
साधक इनमे से किसी एक पथ का
चयन कर, उस पर दृढ़ रहकर ईश्वर
के समर्पण को प्राप्त कर सकता है।

तुलसी, सूर, कबीर, मीरा आदि सबने,
ईश्वर का साक्षात्कार प्राप्त किया,
पर इसके लिए उन्होंने अपने अपने
सद्विचार के पथ का ही चयन किया।

पूरी श्रद्धा से उस पथ पर चलते रहना है,
यह अनन्य श्रद्धा मनुष्य को बल देती है,
यही उसे सब तरह से प्रेरणा देती है,
और पथिक को गंतव्य तक पहुँचाती है।

इस प्रेरणा की तीव्रता श्रद्धा की
तीव्रता के समानुपाती होती है,
इसी श्रद्धा से दृढ़ता उत्पन्न होती है
और श्रद्धा उच्चता प्राप्त करती है।

तब यही श्रद्धा प्रेम में बदल जाती है,
प्रेम की उच्चता विश्वास की दृढ़ता में,
दृढ़ता प्रेम मंदिर का प्रथम सोपान है,
तो भक्ति की दृढ़ता अंतिम सोपान है।

आदित्य जब तक हम अपने लक्ष्य के
प्रति श्रद्धा और दृढ़ता नहीं रखते हैं,
तब तक हम लक्ष्य के कितने भी पास
क्यों न हों, उसे प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *