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पुस्तक और हम

विश्व पुस्तक दिवस

किताबें ही हैं जग का तीसरा नेत्र,
इनसे प्रकाशित जीवन का हर क्षेत्र।
भूत, भविष्य, वर्तमान उजागर करतीं
मन मष्तिष्क का सारा तम हरतीं।

किताबों में बस गया अपना संसार।
शब्द -शब्द को मिल गया यहां प्यार।
अद्भुत नजारा भरा पड़ा ज्ञान का भंडार।
मेरूदंड सा अटूट समाज का विस्तार।

पुस्तक मार्ग दर्शक,प्रेरक सुविचारित से ओतप्रोत।
इनसे मिलते हैं ज्ञान गंगा के अनेकों स्रोत।
पुस्तक मान सरोवर कल कल बहता गंगा नीर।
हरा भरा कर देती ये रहें हम इनके तीर।

इनसे साहित्य,कला, विज्ञान,ज्ञान जीवन पाते हैं ।
संस्कार, न्याय,विधि- विधान पुस्तक से जाने जाते हैं।
किताबें ही हमारी शिक्षक आदर्श मार्ग दर्शक हैं।
प्रेम का दीपक भर देती उजाला पथ प्रदर्शक हैं।

स्वरचित
डॉ सुमन मेहरोत्रा,
मुजफ्फरपुर,बिहार

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