
( नागेश्वर राव कमलेकर ‘कमल’)
पन्नों में सिमटी रोशनी,
अक्षर-अक्षर दीपक हैं,
ज्ञान की इस पावन धारा में,
जीवन के सब प्रतिबिंबक हैं।
जब-जब मन पथ से भटका,
जब-जब राहें अंधियारी थीं,
पुस्तक बनकर साथी मेरी,
ले आई नई चिंगारी थीं।
ये केवल शब्दों का मेल नहीं,
अनुभव की गहराई हैं,
हर पंक्ति में छिपी हुई,
सदियों की सच्चाई है।
कभी बनकर गुरु सिखाती,
कभी मित्र-सी समझाती है,
जीवन के हर उतार-चढ़ाव में,
साहस भी यह बढ़ाती है।
आओ मिलकर प्रण ये लें,
पढ़ने का दीप जलाएँगे,
हर दिल में ज्ञान की खुशबू,
पुस्तकों से महकाएँगे।
पुस्तक ही है सच्चा धन,
जिसका ना कोई अंत है,
जिसने इसे अपनाया जीवन में,
उसका हर क्षण अनंत है।
कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’ हैदराबाद,तेलंगाना।













