
कलम पकड़ कर कुछ सिखा रहे हैं,
तुम्हारी अकल पर हँसा रहे हैं।
नहीं कुछ अभी वो बता सके हैं ,
अभी तो मुझे वो रिझा रहे हैं।
चरण शीश धरमैं लगी नमन में,
अभी राम सिमरन करा रहें हैं।
जगी प्रेम लौ राम साधना में,
बता दूँ किसी को लजा रहे हैं।
‘सुमन’ भक्ति-भाव करुणा भरी है,
हमारे दिलों को सजा रहें हैं।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार










