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विरह

प्रभु-सुमिरण से दूर हुआ हूँ, विरह मन को सूना कर गया।
नाम बिना यह जीवन, विरह का बंजर बनकर रह गया।

हाथों में माला है, पर विरह में भाव बिखर जाते हैं।
स्मरण छूटते ही, विरह में अंतर आँसू बन जाते हैं।

हर श्वास में था नाम, अब विरह में सब मौन हुआ।
मन विरह की व्यथा में डूबा, हर क्षण जैसे शून्य हुआ।

चेतना भटकती है अब, विरह के गहरे अंधकार में।
अंतर जलता रहता है, विरह की अग्नि के प्रहार में।

हे प्रभु! इस विरह में फिर सुमिरण का दीप जगा दो।
विरह की इस रात्रि में तुम भक्ति-पथ मुझे दिखा दो।

ताकि यह विरह ही अब मेरा सच्चा साधन बन जाए।
और यही विरह अंततः मुझे तुम तक पहुँचा जाए।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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