
संजा आत देर से बेजा,
थकी दुपहरिया जात नैया।
सूरज इतई पे डारे डेरा,
खूब कर रओ मनमानी।
अबकी गरमी बेजा उबरानी।
तन को पसीना सूखत नैय्या,
पानी पी पी फूले पेट।
लपट लगे हंटर के जैसी,
गरमी के ठाठ जैसे महारानी।
अबकी गरमी बेजा उबरानी।
बाहर जाबे की नैया हिम्मत
घर में चैन पड़त नैया।
कूलर पंखा फैल हो गए,
बरफ़ से भी तबियत ने जुड़ानी।
अबकी गरमी बेजा उबरानी।
गोड़ पड़ूं तेरे सूरज दादा,
छोड़ दो अपनी रंगदारी।
बदरा तनक फुहार गिरा दो,
टूटे गरमी की मनमानी।
अबकी गरमी बेजा उबरानी।
डॉ.दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)











