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मैं जब भी लिखूँगी

मैं जब भी लिखूँगी,
बेशुमार लिखूँगी,
छिप कर रह गई जो,
हर बात लिखूँगी।

तुम समझ रहे हो तिनका,
मैं कायनात लिखूँगी,
कोई खोल दे पर मेरे,
मैं परवाज़ लिखूँगी।

जो डर से सिमट कर रह गई,
हर वो आवाज़ लिखूँगी,
जो मन में छिपा हो,
हर वो राज़ लिखूँगी।

जो देखा नहीं किसी ने,
वो हाल लिखूँगी,
जिनके मिलते नहीं जवाब,
वो सवाल लिखूँगी।

जो मिलता नहीं किसी से,
वो मिज़ाज लिखूँगी,
सबको लगती हो कविता,
मैं अल्फ़ाज़ लिखूँगी।

जो अधूरे रह गए,
वो अरमान लिखूँगी,
पंख थकते भी हों तो,
फिर भी उड़ान लिखूँगी।

जब छिप जाएँ आँसू,
तो बरसात लिखूँगी,
बिखरी हो चाँदनी जैसी,
ऐसी रात लिखूँगी।

बातें लोगों पर ठहरी हों,
वो मजबूरी लिखूँगी,
कर दे एहसास मुकम्मल,
वो कविता पूरी लिखूँगी।

जिस पर ज़िंदगी चले,
वो अपना दस्तूर लिखूँगी,
जो मुझे कामिल करे,
उसे अपना नूर लिखूँगी।

मैं जब भी लिखूँगी,
बेशुमार लिखूँगी।

मेघा दास
सरायपाली महासमुन्द छ.ग

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