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अनसुनी, अनदेखी आवाज़

तुम्हारी याद के साये में, सिमट कर रह गई हूँ मैं,
कि जैसे अनसुनी-अनदेखी, आवाज़ बन गई हूँ मैं।

वो तीन शब्द ‘I Love You’, जो तुमने विदा में बोले थे,
वही संबल हैं जीवन के, जो मेरे मन ने तोले थे।

मगर जब दूर सरहद पर, तुम खोजी बन के चलते हो,
यहाँ घर के मंदिर में, तुम्हारी सलामती के दीए जलते हैं।

तुम्हारे बिन मेरा होना, न होना एक जैसा है,
कोई सुनता नहीं मन की, ये सूना घर ही ऐसा है।

लिखती हूँ रोज़ डायरी में, जो बातें तुमसे कहनी थीं,
वो सिसकियाँ जो आँखों से, अश्क बन कर बहती थीं।

पहुँचती ही नहीं तुम तक, मेरी ये मौन व्याकुलता,
मेरी हर बात को साहिब, यहाँ अनसुना ही किया जाता।

मेरी बिंदिया भी फीकी है, मेरी चूड़ियाँ भी रोती हैं,
तुम्हारे बिन मेरी रातें, कहाँ अब चैन से सोती हैं?

किसी को फर्क क्या पड़ता, मैं घर में हूँ या पत्थर हूँ,
बिना साजन के चौखट पर, मैं बिखरा हुआ मंज़र हूँ।

बहुत कर ली अपने देश की सेवा, अब अपना घर भी खोजो तुम,
मेरी इस अनसुनी आवाज़ का, अब दर्द समझो तुम।

बुलाती हैं तुम्हें यादें, ये सिंदूर और ये बिंदिया,
लौट आओ कि रूठी है, इन आँखों से मेरी निंदिया।

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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