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लेख- तकनीक ने छीनी पहचान।


आज का मनुष्य तकनीक का गुलाम हो गया है। तकनीक ने सामाजिक ताने-बाने को काफी नुकसान पहुंचाया है। हम हर वर्ष एक लाख बीस हजार शब्द कम बोल रहे हैं। तकनीक से जो हमारी रिश्तेदारी निभ रही है, एक दिन हम भी मशीनी बनकर संवेदनहीन हो जायेंगे। तब आप अपना दुखड़ा वर्डस्एप, इंस्टा माई के आगे रोना। आप जानते हैं, तकनीक का भक्त बनने के कारण हमारे द्वारा रोजाना बोले जाने वाले शब्दों की संख्या में 28 प्रतिशत की तेज गिरावट देखी जा रही है। तकनीक ने बचपन छीन लिया है, रिश्ते छीन लिए है और जीवन का अनुभव छीन लिया है। आज तकनीक माँ- बाप बनकर शिक्षा देने लगी है, जन्म देने वाले माता- पिता के लिए हमारे पास समय ही नहीं बचा।
मैं तकनीक का विरोधी नहीं हूँ, मैं तकनीक से जन्मी संवेदनहीनता, अजनबीयत का विरोधी हूँ। आओ मिलकर एक संवाद करें, संवेदनहीनता छोड़कर अपनों का ख्याल करें।

लोकेश कौशिक
सहायक प्रोफेसर हिन्दी
हरियाणा।

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