
विधा- गीत सृजन
बौरी अमराई में कोयल जाने क्या -क्या गाती है।
हो कुछ भी पर ये कोयल है मीठी तान सुनाती है।।
मंद पवन जब छू ले डाली, पात-पात मुस्काते हैं,
फूलों की खुशबू संग-संग मन को रस भर जाते हैं।
नीले गगन की छाया में स्वर लहरी लहराती है,
हो कुछ भी पर ये कोयल है मीठी तान सुनाती है।।
साँझ ढले जब लौट पखेरू अपने नीड़ बसाते हैं,
थके हुए हर दिल के अंदर मधुर भाव जग जाते हैं।
कोयल अपनी तान सुनाकर पीर सभी हर जाती है,
हो कुछ भी पर ये कोयल है मीठी तान सुनाती है।।
भोर हुई जब ओस झरे, कलियाँ चुपके हँसती हैं,
कोयल मीठे सुर में जैसे नव आशा भरती है।
सूने मन के आँगन में खुशियों दीप जलाती है,
हो कुछ भी पर ये कोयल है मीठी तान सुनाती है।।
जब बसंत की आहट पाकर वन उपवन मुस्काते हैं,
नव पल्लव की छाँव तले मधु गीत स्वयं गाते हैं।
कोयल राग सुनाकर मन में प्रेम सुधा बरसाती है,
हो कुछ भी पर ये कोयल है मीठी तान सुनाती है।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












