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सिसकती मानवता(लघुकथा)

“माँ मुझे भूख लगी है कुछ खाने दो न।”” हां बेटा अभी देती हूं “कहते हुए उसने अपने थैले से एक छोटा सा बिस्किट का पैकेट निकाल कर उसे पकड़ा दिया। माँ बारात में लाइट लेकर चल रही थी। साथ में उसका चार पांच साल का बेटा भी था।अभी उसने पैकेट खोलकर खाना शुरू ही किया था कि नाचने वालों की टोली में से किसी का धक्का लगा और पैकेट जमीन पर जा गिरा,वह झुक कर उठाना चाहता था पर तब तक तो वह पैकेट नाचने वालों के पैरों तले रौंदा जा चुका था। बेचारा बच्चा रोने लगा। “अरे हटाओ इस बच्चे को फालतू खुशी में विघ्न डाल रहा है। “तब तक डेकोरेशन मैनेजर भी वहां पहुंच गया शायद किसी ने शिकायत कर दी होगी। “तुमसे कहा था न कि साथ में बच्चे लाना मना है मैं किसी को भेजता हूं अपनी लाइट उसे पकड़ा कर जाओ तुम आज के कोई पैसे नहीं मिलेंगे। ” मैनेजर दहाड़ा तो वह गिड़गिड़ा उठी ” नहीं साब ऐसा मत कीजिए मुझे पैसे की बहुत जरूरत है। अब मेरे बेटे से किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। “बच्चा भी सहम गया और माँ का पल्लू पकड़ कर चुपचाप चलने लगा।जैसे जैसे बारात लड़की वालों के घर के नजदीक आती जा रही थी बारातियों जोश बढ़ता जा रहा थे और बच्चे की भूख भी। बारातियों को वेलकम स्नैक्स ,कोल्ड ड्रिंक सर्व किए जा रहे थे बच्चे ने भी हाथ बढ़ाया पर दुत्कार कर दूर कर दिया गया। उसकी आंखों में भूख का दर्द और माँ की आंखों में मजबूरी थी जो झूमते नाचते बारातियों में से किसी को भी दिखाई नहीं दे रही थी। आखिर जब मां जब फुर्सत होकर वापस आई वह बच्चा मैदान में बेहोश हो चुका था। लोग चिल्ला रहे थे “अरे हटाओ इसे।इसे अंदर किसने आने दिया। जाने कहां कहां से आ जाते हैं विघ्न डालने।”माँ ने घबराकर बच्चे को अपनी गोद में उठाया किस की फेंकी हुई बोतल से पानी बच्चे के मुंह आंखों पर डाला और जैसे ही उसने आँखें खोली उसे लेकर चुपचाप चल पड़ी। मानवता सिसक रही थी और लोग जश्न मनाने में व्यस्त थे।

डॉ. दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)

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