
जब रिश्तों में छल की खबरें सामने आती हैं,
नाम बदल कर सच्चाई क्यों छिपाई जाती है?
अगर कहीं भी ज़बरदस्ती या धोखा होता है,
तो उस पर खुलकर बोलना ही सच्चा होता है।
फिर क्यों कुछ सवाल हवा में ही रह जाते हैं,
क्यों कुछ मुद्दों पर कदम ठिठक से जाते हैं?
क्या सच इतना कमजोर है, या डर इतना भारी है,
जो आवाज़ उठे भी तो आधी-अधूरी जारी है?
ये भी सच है हर रिश्ता धोखा नहीं होता,
हर कहानी में साज़िश का रोष नहीं होता।
कई दिल अपने फैसले खुद ही चुन लेते हैं,
कानून के दायरे में सपने भी बुन लेते हैं।
पर जब भी कोई अन्याय कहीं पर होता है,
वो धर्म नहीं, इंसानियत से टकराता है।
गलत अगर है तो गलत ही कहा जाना चाहिए,
हर सच को बिना डर के सामने आना चाहिए।
भाईचारे के नारे तभी मायने रख पाएंगे,
जब न्याय के दीप हर दिल में जल पाएंगे।
वरना ये शब्द भी बस गूंज बनकर रह जाएंगे,
और सवाल हमारे यूं ही भटकते रह जाएंगे।
पर क्यों अक्सर किस्सों में एक ही चेहरा दिखता है,
अब्दुल ही क्यों राजू बनकर फिरता दिखता है?
क्यों हर चर्चा में वही अंदेशा दिखता है,
क्यों नाम बदलने की बातें सुनाई देती हैं?
क्यों नेहा की कहानी यूँ बदल जाती है,
क्यों पहचान की परतें कहीं ढल जाती हैं?
और मन ये पूछे क्या ये सच का पहलू है,
या अधूरी खबरों का कोई जालू है?
क्यों श्याम की राहें कम सुनाई देती हैं,
क्यों सलमा की बातें कम दिखाई देती हैं?
क्या सच में तराज़ू एक तरफ झुका हुआ
आर एस लॉस्टम












