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ईर्ष्या तू ना गई मेरे मन से

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक ,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।

तू सुबह चाय के साथ आती है, मेरे मन से। खिड़की के बाहर धूप पड़ोस के छज्जे पर पड़ती है तो लगता है मुझसे पहले वहाँ क्यों गई। अखबार में किसी का नाम छपता है तो चाय फीकी लगती है। मैं हँसता हूँ, बधाई भी देता हूँ, पर भीतर कहीं नमक सा चुभता है। तू बड़ी ज़िद्दी है। पूजा में बैठो तो घंटी की आवाज़ के साथ भी बजती है। ध्यान लगाऊँ तो याद दिलाती है कि शर्मा जी का बेटा विदेश चला गया।

तू रिश्तों में नमक की तरह है। कम हो तो स्वाद नहीं, ज़्यादा हो तो खाना ही खराब। माँ कहती थी बेटा दूसरे की थाली मत देख, अपनी रोटी गर्म खा। पर तू आँखों में ऐसा चश्मा लगाती है कि अपनी रोटी में घी कम दिखता है और दूसरे की सूखी रोटी पर भी मक्खन नज़र आता है।

मोहल्ले में नया स्कूटर आया। लड़का हँस कर बोला भैया देखना। मैंने देखा। स्कूटर चमक रहा था पर मेरा मन बुझ गया। रात को अपना पुराना स्कूटर पोछते हुए सोचा कि ये भी तो वफादार है। दस साल से धक्का नहीं लगवाया। पर तू कान में बोली, उनके पास नया है। तू तुलना की वो तराजू है जिसमें अपना पलड़ा हमेशा हल्का लगता है।

ऑफिस में तरक्की की लिस्ट लगी। मेरा नाम तीसरे नंबर पर था। घर आकर मिठाई लाया। बीवी ने पूछा पहले नंबर पर कौन। बस, मिठाई का डिब्बा खुला का खुला रह गया। तूने स्वाद बदल दिया। पहले नंबर वाला भी दोस्त है। कल तक साथ चाय पीते थे। आज उसकी हँसी चुभती है। तू रिश्तों को अंकों में बदल देती है।

फेसबुक खोलो तो तू वहाँ पहले से बैठी मिलती है। किसी की गोवा वाली फोटो, किसी के बच्चे का मेडल, किसी की नई कार। स्क्रॉल करते करते अपना कमरा छोटा लगने लगता है। अपना पंखा धीमा लगता है। अपना खाना सादा लगता है। जबकि दस मिनट पहले तक सब ठीक था। तू दो इंच की स्क्रीन में पूरा मोहल्ला भर देती है और फिर आग लगा देती है।

गाँव में काका कहते थे, ईर्ष्या वो दीमक है जो लकड़ी को अंदर से खा जाती है, बाहर से पॉलिश वैसी की वैसी। ऊपर से मैं भी पॉलिश वाला ही दिखता हूँ। मिलता हूँ तो गले लगाता हूँ। पीठ थपथपाता हूँ। पर भीतर तू हिसाब लगाती रहती है कि उसके पास मुझसे क्या ज़्यादा है।

मंदिर में प्रसाद बँट रहा था। पंडित जी ने पहले उसे दिया जो लाखों का दान देता है। मुझे बाद में मिला। तू तुरंत बोली, देख, भगवान भी अमीर का है। मैं हँसा। सोचा, प्रसाद तो प्रसाद है, पहले मिले या बाद में। पर तू माने तब न। तू हर जगह कुर्सी की गिनती करती है कि मैं कौन सी पंक्ति में बैठा।

तू बच्चों को भी नहीं छोड़ती। स्कूल में शर्मा आंटी का बेटा नब्बे प्रतिशत लाया। मेरा बेटा अस्सी लाया। मैं घर आया तो बेटे की कॉपी नहीं देखी, पहले शर्मा आंटी का स्टेटस देखा। बेटे ने पूछा पापा खुश हो। मैं बनावटी हँसा। तूने मेरे मुँह का स्वाद खराब कर दिया और उसके मन का भी।

तू राजनीति में सबसे ज़्यादा चलती है। नेता का कुरता देख कर लगता है मेरे पास क्यों नहीं। उसके भाषण पर ताली बजती है तो अपने शब्द छोटे लगते हैं। फिर हम भीड़ में चिल्लाते हैं, गाली देते हैं। असल में वो गाली उसे नहीं, अपनी कमी को देते हैं। तू हमें आईना नहीं देखने देती, बस खिड़की से दूसरा घर दिखाती है।

बाज़ार में तू हर दुकान पर खड़ी है। नया मोबाइल निकला तो अपना वाला पुराना लगता है। नया सूट आया तो अपनी अलमारी खाली लगती है। दुकानदार तुझे जानता है। वो जानता है कि तू जेब खाली करवा देगी। इसलिए वो सामान कम, जलन ज़्यादा बेचता है। हम खरीदते हैं, दो दिन खुश रहते हैं, तीसरे दिन किसी और के पास कुछ नया देख कर फिर दुखी।

तू शादी में भी मेहमान बन कर आती है। दाल में नमक देखती है, टेंट का कपड़ा देखती है, दुल्हन के गहने गिनती है। खाने की तारीफ करते करते भी जोड़ती है कि हमारे वाले ब्याह में तो पनीर कम था। तू खुशी के गले में ऐसा ढोल बाँध देती है कि बजता ही रहता है, बजता ही रहता है।

कभी कभी लगता है तू ज़रूरी भी है। तू न हो तो दौड़ खत्म हो जाए। तू ही तो कहती है उठ, वो देख आगे निकल गया। तेरी वजह से ही आदमी सवेरे उठता है, काम पर जाता है। पर तू मास्टरजी कम, जुआरी ज़्यादा है। तू कहती है और लगा, और लगा। घर फूँक कर भी बाज़ी जीतने को कहती है।

मैंने तुझसे लड़ना चाहा। किताबें पढ़ीं। साधु से मिला। सबने कहा संतोष रखो। मैंने संतोष की चादर ओढ़ी। पर तू चादर में छेद करके अंदर आ गई। बोली, देख उसके पास कंबल है। फिर समझा कि तू जाएगी नहीं। तू मन का वो कोना है जहाँ हमेशा अंधेरा रहता है। बल्ब लगा दो तो तू बल्ब गिनने लगती है कि उसके घर में ज़्यादा वॉट का क्यों है।

अब मैंने तुझसे दोस्ती कर ली। जब तू आती है तो मैं तुझे चाय पिलाता हूँ। कहता हूँ बैठ। बात करते हैं। तू बताती है कि सामने वाला मेहनती है। मैं मान लेता हूँ। तू बताती है कि मैं कहाँ कमजोर हूँ। मैं सुन लेता हूँ। फिर मैं तुझे काम पर लगा देता हूँ। कहता हूँ चल, उसकी तरह मेहनत करते हैं, पर उससे नहीं, कल वाले अपने आप से लड़ते हैं।

तू तब भी मानती नहीं। कहती है, पर वो तो फिर भी आगे है। मैं हँसता हूँ। कहता हूँ तो क्या। उसकी दौड़ उसकी, मेरी दौड़ मेरी। मेरा पेट मेरी रोटी से भरता है, उसकी थाली देखने से नहीं। तू बुरा मान जाती है। थोड़ी देर चुप रहती है। फिर किसी और का नाम लेकर आ जाती है।

ईर्ष्या, तू सच में ना गई मेरे मन से। शायद जाएगी भी नहीं। तू कील की तरह है। ठोक दो तो भी निशान रह जाता है। पर अब मैं निशान को घाव नहीं बनाता। उसे खरोंच की तरह देखता हूँ जो याद दिलाती है कि मैं ज़िंदा हूँ, कि मैं चाहता हूँ, कि मैं बढ़ना चाहता हूँ।

बस इतना सीख गया हूँ कि तुझे मालिक नहीं बनने देना। तू ड्राइवर नहीं, सवारी है। पीछे बैठ। रास्ता मैं चुनूँगा। तू खिड़की से देख और बता कि बाहर क्या चल रहा है, पर स्टेयरिंग मत माँग।

लोग पूछते हैं सुखी कैसे रहें। मैं कहता हूँ ईर्ष्या को निकालो मत, पालो मत। उसे काम पर लगाओ। जब वो कहे उसके पास बड़ी गाड़ी है, तो पूछो अपनी गाड़ी समय पर सर्विस हुई कि नहीं। जब वो कहे उसके बच्चे होशियार हैं, तो अपने बच्चे से दो मिनट बात कर लो। तू आग है। रोटी भी सेंक सकती है और घर भी जला सकती है। चूल्हे तक ठीक है, छप्पर पर मत चढ़ने देना।

अंत में यही कि तू है तो मैं हूँ। पर मैं तू नहीं हूँ। तू मेरे मन का एक कमरा है, पूरा घर नहीं। मैं दरवाजा खुला रखता हूँ, हवादार रखता हूँ, ताकि तू घुटन न बन जाए। आ, बैठ, पर हुक्म मत चला।

ईर्ष्या, तू ना गई मेरे मन से, पर अब तेरी चलती भी नहीं मेरे मन में। इतना बहुत है।

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