
निज देश की उन्नति गौरव ही,
जिनकी आँखों का सपना है।
निज देश की भाषा संस्कृति ही,
सर्वोपरि जिनको रखना है।
जिनको भारत की पुण्य भूमि,
अपने प्राणों से प्यारी हैँ।
ऊंच नीच का भेद नहीं,
समरसता जिनकी न्यारी है।।
अपनी माटी पर गर्व करे,
चंदन सी,संस्कार वारी है।
जन्मभूमि जननी से बढ़कर,
लगती जिनको प्यारी है।।
सीमा पर जो है अडिग खड़े,
रक्षा का संकल्प लिए।
घर-आँगन की खुशियाँ त्यागें,
भारत का उत्कर्ष लिए।
जल थल नभ पर जो निगाह रखें,
करते सीमा रखवाली है।
वंदनीय है शूरवीर वह,
श्रद्धा के अधिकारी हैं।।
सत्य अहिंसा की राहों पर,
जो अपना जीवन ढालें हैं।
परहित में ही सुख मानें,
जो दिल के भोले भाले हैं।
जो मानवता के हैं पोषक,
सुख शांति जिन्हें अति प्यारी है।
सत्य न्याय संभल जिनका,
स्वाभिमानी राष्ट्र हितकारी है।।
मेहनत,साहस औ समर्पण,
जिनकी है पहचान बनी।
हर मुश्किल में हँसते रहते,
हिम्मत जिनकी शान बनी।।
नमन करें ऐसे वीरो को,
भारत के अभिमानी हैं।
देश पे मर मिटने का जज्बा,
वो सच्चे हिंदुस्तानी हैं।।
जाति-पांति का भेद मिटाकर,
सबको गले लगाये हम।
सच्चे हिंदुस्तानी बनकर,
प्रेम का दीप जलाये हम।
ऐसे ही वीर सपूतों से,
वसुधा की अमर रवानी है।
करता में कोटि-कोटि बंधन,
जो सच्चे हिंदुस्तानी है।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश












