
कैसा होगा इस जीवन का सफर,
इसका भला किसको आभास है,
अच्छी गुज़री तो जीते जी स्वर्ग है,
ज़ो नही गुज़री तो सज़ाये जुर्म हैl
पर अब तो ज़िंदगी बोनस में है,
इसे बिंदास, बेफ़िक्र जीना है,
आभास भी है, इत्तिफ़ाक़ भी है,
फिर सोचने की गुफ़्तगू क्या है!
रामायण के मुख्य पात्र शपथ में
बंधे रहकर ही सारा जीवन जिये,
प्राण ज़ाहिं पर वचन न जाहीं की
शपथ के साथ ही वह मर भी गये।
दशरथ, श्रीराम, सीता जी, लक्ष्मण,
व उनके साथ भरत जी व शत्रुघ्न भी,
यहाँ तक लंकापति रावण, मेघनाद,
कुंभकरन, जटायु व वानरराज बाली भी।
रामायण में एक तरफ़ प्रेम व त्याग
का संदेश हर मुख्य पात्र देता रहा,
दूसरे रावण पक्ष जो उनके प्रेम और
त्याग से ही छल कपट करता रहा।
महाभारत में कौरव और पांडव भी
अधिकार के लिये लड़कर मर गये,
साम्राज्य आधे की तो बात थी, पर
पाँच गाँव भी देने के लिये मुकर गये।
रामायण महाभारत ग्रंथ दोनो युग
परिवर्तन के सांस्कृतिक आधार थे,
आदित्य धर्म की ख़ातिर श्री राम
और श्रीकृष्ण दोनो ही अवतार थे।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












