
विषय–ज़ज्बात के इशारे
कविता–एक ज़माना वो भी था
90’s के प्रेम पर मेरी एक पेशकश
एक ज़माना वो भी था जब उनको नज़रों से ताका करते थे
आंखों ही आंखों मे हालचाल ले लिया करते थे
धड़कनों की तेजी से उनके आस पास होने का अहसास होता था
एक झलक उनकी देखने को दिल बदहवास होता था
क्या आंधी क्या बारिश क्या तूफां साथ होने का अहसास होता था
हाल-ए-दिल बयाँ करने के लिये पत्थर ओर कागज का टुकडा साथ होता था
रूमानी मौसम ठंडी बयार की अन्गड़ाई से दीदार को दिल तड़फ तड़फ जाता था
जीना नही आता था फिर भी जी जी जाता था
प्यार क्या होता था ये समझ आता था
रूमानी गानों पर रूमानी मौसम मे उनके साथ का स्वप्न दिख जाता था
क्या रात क्या दिन समय इसी मे कट जाता था
उनकी एक झलक पाने को दिल मचल मचल जाता था
यार छेड़ते थे तो एक कसक दिल मे आती थी
जमाने को दिखाने की हसरत जाग जाती थी
आधी रात को भी उनकी आहत से दिल बेचैन हो जाता था
बहुत याद आती हो तुम बहुत याद आती थी
ज़िंदगी यूँ ही सांसों मे बही जा रही है रूह तो फना हो चुकी है
ना जमाने से रिश्ता है ना तुमसे नाता है
प्यार क्या होता था समझ आता है
एक झलक पाने को दिल मचल मचल जाता है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












