
सृजन शब्द _ गगरी
गगरी भरके वृषभानु लली(दुलारी बेटी), छनकार किए धरती चलती ।
मन मोह लिया तब केशव का, जब सोलह साज सदा सजती ।।
लटके निज कानन कुण्डल भी, पग नूपुर भी बजती रहती ।
चमके सिर ऊपर बिंदुलिया, नयनों भर काजल पी(पिया) भजती ।।
बरखा बरसे नव चेतन सी, धरती तब तृप्त बने सजना।
नयना बरसे जब पी(पिया) मिलने, रटते रहते बस श्री जपना।।
मनवा वृषभानुसुता कहता, यह प्रीतम(कृष्ण) ईश लगे अपना।
भ्रम है दुनिया यह जाल मना(मन), शरणा जगदीश पड़े रहना।।
नयना भर काजल मोहनिया, मन मोह लिया करुणाकर जी ।
पगली बनके चहुँ ओर फिरूँ, बन कृष्ण घटा सम छाकर जी ।।
बन में भटकूँ फिर श्याम मिलूँ, अब धन्य हुई रज पाकर जी ।
विनती इतनी दर पे अपने, रखलो हमको कह चाकर जी ।।
दीपिका किशोरी ‘चांँदनी’
गुजरात












