
विधा :काव्य
रवीन्द्र का स्वर, गूंजे हर मन में,
शब्दों में जैसे संगीत सजा।
कोलकाता की उस धरती से,
एक ज्ञान-सूर्य जग में उगा।
शांति निकेतन की छाँव तले,
प्रकृति संग शिक्षा का राग रचा,
खुले गगन में सपने बोए,
मानवता का दीप सदा जला।
गीतांजलि की अमर पंक्तियाँ,
आत्मा को स्पर्श कर जाती हैं,
प्रेम, करुणा, सत्य की बातें,
हर हृदय में दीप जलाती हैं।
नोबेल का वह गौरव क्षण,
भारत का मान बढ़ा गया,
पहला एशियाई बन जग में,
साहित्य का सिर ऊँचा किया।
जन-गण-मन की मधुर धुन में,
राष्ट्रभक्ति का भाव भरा,
रवीन्द्र का अमर यह काव्य,
युग-युग तक जग में रहेगा खिला।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












