
परमपिता परमेश्वर की महिमा,
मानव का जीवन देकर भेजा है,
उसको शत शत नमन, प्रणाम है,
कोटिश: ईश्वर का धन्यवाद है।
चाहत नहीं है मेरी कि मैं
अपना यशोगान करवाऊँ,
ख़्वाहिश नहीं है मेरी कि मैं,
औरों से ख़ुद को श्रेष्ठ कहूँ।
मैं जो भी हूँ, जैसा भी हूँ,
मैं उतने में ही खूब ख़ुश हूँ,
धन, दौलत, यश आते जाते हैं,
इनका मोह नहीं करता हूँ।
परहित ही मेरा लक्ष्य बन गया,
सबसे सद्व्यवहार मैं करूँ सदा,
सबकी इज़्ज़त, सबकी सेवा का,
आजीवन ध्यान में मैं रखूँ सदा।
मेरा यह सिद्धांत अटल है,
मानव के खातिर सदा जिऊँ,
आदित्य मानवता के लिए मरूँ,
धर्म दया-क्षमा-प्रेम का अपना लूँ।
डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












