
“वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः।।”(ऋग्वेद 9.63.5)
अर्थ: हम राष्ट्र में जागरूक और मार्गदर्शक बनें।
भारतीय वैदिक संस्कृति केवल व्यक्तिगत साधना, उपासना या कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह समष्टिगत चेतना, लोकमंगल और राष्ट्रधर्म का दिव्य दर्शन प्रस्तुत करती है। ऋग्वेद का यह महान मंत्र “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” भारतीय राष्ट्रचेतना का ऐसा सार्वकालिक उद्घोष है, जो प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्रहित में जाग्रत, सजग और उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देता है। यह मंत्र ऋग्वेद के नवम मंडल के 63वें सूक्त का पाँचवां मंत्र है। ऋग्वेद वेदों में सर्वप्राचीन माना गया है, जिसमें मानव जीवन, प्रकृति, देवत्व, समाज, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना से संबंधित गहन विचार समाहित हैं।
“नवम मंडल” मुख्यतः “सोम” की महिमा तथा अंतर्मन के दिव्य जागरण का प्रतीक माना जाता है। इसी संदर्भ में यह मंत्र केवल बाहरी राष्ट्रव्यवस्था की नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जागृत रखने की प्रेरणा देता है। इस श्लोक में “वयं” सामूहिक चेतना का प्रतीक है, “राष्ट्रे” सांस्कृतिक राष्ट्रधर्म का द्योतक है, “जागृयाम” आत्मबोध और कर्तव्य-जागरण का संकेत देता है तथा “पुरोहिताः” ऐसे मार्गदर्शकों का प्रतीक है, जो समाज के आगे चलकर लोकहित और राष्ट्रहित का मार्ग प्रशस्त करें। यही कारण है कि यह मंत्र आज भी भारतीय संस्कृति में राष्ट्रधर्म, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण की प्रेरणा के रूप में अत्यंत प्रासंगिक माना जाता है।
इस महान वैदिक मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी समष्टिगत चेतना है। यहाँ “वयं” शब्द केवल “मैं” का विस्तार नहीं, बल्कि “हम” की एकात्म भावना का उद्घोष है। भारतीय अद्वैत दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि एक ही परम चेतना की अभिव्यक्ति है; इसलिए व्यक्ति स्वयं को केवल निजी अस्तित्व तक सीमित नहीं मानता, बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्वचेतना का अभिन्न अंग अनुभव करता है।
“राष्ट्रे” शब्द का अर्थ केवल भौगोलिक सीमा, राजनीतिक सत्ता या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि वह संस्कृति, धर्म, ज्ञान, परंपरा, लोकजीवन, नैतिकता और राष्ट्रीय आत्मा से युक्त जीवंत सत्ता है। वैदिक ऋषियों ने राष्ट्र को मात्र शासन प्रणाली नहीं माना, बल्कि उसे आध्यात्मिक चेतना का विस्तार समझा है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में भूमि को माता कहा गया —
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
जब व्यक्ति राष्ट्र को माता के रूप में अनुभव करता है, तब उसके भीतर सेवा, समर्पण और संरक्षण की भावना स्वतः जागृत होती है। यह मंत्र हमें “मैं” से “हम” की यात्रा कराता है। यदि समाज में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने सुख और स्वार्थ की चिंता करे, तो राष्ट्र कमजोर हो जाएगा; किंतु जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को राष्ट्र की चेतना का अंग मानेगा, तब राष्ट्र दिव्य शक्ति बन जाएगा। यही “वयं” की भावना भारतीय राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला है।
इस श्लोक में “जागृयाम” शब्द अत्यंत गहन और व्यापक अर्थ रखता है। इसका अर्थ केवल शारीरिक रूप से जागना नहीं, बल्कि अंतर्मन में विवेक, आत्मबोध और कर्तव्यचेतना का प्रकाश प्रज्वलित करना है। वैदिक दृष्टि में जागरण केवल बाहरी व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि आत्मजागरण के लिए भी आवश्यक माना गया है। जो व्यक्ति स्वयं मोह, आलस्य, स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान में डूबा हो, वह समाज या राष्ट्र का मार्गदर्शक नहीं बन सकता है। इसलिए ऋषियों ने पहले आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और आत्मबोध पर बल दिया।
जैसे दीपक स्वयं जलकर ही दूसरों को प्रकाश देता है, वैसे ही जाग्रत आत्मा ही समाज और राष्ट्र को दिशा प्रदान कर सकती है। वैदिक दृष्टिकोण में सोया हुआ समाज पतन की ओर अग्रसर होता है, जबकि जाग्रत समाज संस्कृति, सृजन और समृद्धि की ओर बढ़ता है। यही कारण है कि ऋषियों ने केवल व्यक्तिगत मुक्ति का संदेश नहीं दिया, बल्कि सामूहिक जागरण का मंत्र प्रदान किया। आज के युग में यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि आधुनिक मनुष्य भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक तनाव, विभाजन, हिंसा और स्वार्थ से घिरता जा रहा है। “जागृयाम” हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल शासन से नहीं, बल्कि जाग्रत और नैतिक नागरिकों की चेतना से जीवित रहता है।
“पुरोहिताः” शब्द का अर्थ सामान्यतः यज्ञ कराने वाले पुरोहित से लिया जाता है, किंतु वैदिक दृष्टि में इसका अर्थ अत्यंत व्यापक है। “पुरः” अर्थात आगे और “हित” अर्थात कल्याण। जो आगे बढ़कर समाज और राष्ट्र का हित करे, वही वास्तविक पुरोहित है। इस दृष्टि से प्रत्येक शिक्षक, संत, साहित्यकार, वैज्ञानिक, चिकित्सक, किसान, सैनिक, समाजसेवी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक पुरोहित है, यदि वह अपने कर्म द्वारा समाज को सही दिशा देता है।
वैदिक संस्कृति में पुरोहित वह था, जो स्वयं तप, त्याग, सत्य और अनुशासन का पालन करके समाज को धर्ममय जीवन की प्रेरणा देता था। आज आवश्यकता केवल राजनीतिक नेताओं की नहीं, बल्कि ऐसे जाग्रत पुरोहितों की है, जो समाज में सत्य, नैतिकता, करुणा, कर्तव्य और एकता का प्रकाश फैलाएँ। जब शिक्षक केवल नौकरी न करके राष्ट्रनिर्माता बनता है, साहित्यकार केवल शब्द न रचकर चेतना जगाता है, युवा केवल अधिकार न माँगकर उत्तरदायित्व निभाता है और नागरिक केवल आलोचना न करके सहभागिता करता है, तभी यह मंत्र सार्थक होता है।
यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकार का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का तप है। किसान अन्न उगाकर, सैनिक सीमा की रक्षा करके, वैज्ञानिक नवाचार करके और गुरु ज्ञान देकर राष्ट्रचेतना को जीवित रखते हैं। यही “पुरोहिताः” का वास्तविक स्वरूप है।
भारतीय अद्वैत दर्शन का मूल सिद्धांत है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही परम ब्रह्म का विस्तार है। जब यह भाव राष्ट्रजीवन में उतरता है, तब जाति, भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय और वर्ग के भेद स्वतः गौण हो जाते हैं। व्यक्ति दूसरे को पराया नहीं मानता, बल्कि उसी परम चेतना का अंश समझता है। यही “वयं” की वास्तविक अनुभूति है। यह मंत्र राष्ट्र को केवल राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एकात्मता का जीवंत रूप मानता है।
भारतीय संस्कृति चिरपुरातन होते हुए भी नितनूतन इसलिए है, क्योंकि वह सत्य को शाश्वत मानते हुए समय के अनुसार उसकी अभिव्यक्ति को नवीन रूप देती रहती है। यही कारण है कि हजारों वर्ष पूर्व उच्चारित यह मंत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के विभाजन, संघर्ष और स्वार्थ से ग्रस्त है, तब यह वैदिक मंत्र नैतिक पुनर्जागरण का संदेश देता है। यदि समाज में “वयं” की भावना जीवित रहेगी, तो विभाजन और संघर्ष समाप्त होंगे। यदि समाज के भीतर पुरोहितवत् मार्गदर्शक चेतना बनी रहेगी, तो संस्कृति अक्षुण्ण रहेगी और यदि नागरिक जाग्रत रहेंगे, तो राष्ट्र सुरक्षित और समृद्ध रहेगा। यही अद्वैत का सामाजिक रूप है, जहाँ सम्पूर्ण समाज एकात्म भाव से जुड़ जाता है और राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में विकसित होता है।
“वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” श्लोक पंचइहलोक में मुख्यतः राष्ट्रीयलोक से संबंधित है, क्योंकि इसमें सम्पूर्ण राष्ट्रचेतना, सामूहिक जागरण और राष्ट्रहित के मार्गदर्शन का संदेश निहित है। पंचइहलोक (ग्रामीयलोक, खंडीयलोक, प्रभागीयलोक, प्रांतीयलोक और राष्ट्रीयलोक) भारतीय सामाजिक संरचना के क्रमिक विकास का प्रतीक हैं।
यह मंत्र केवल किसी एक ग्राम, क्षेत्र या प्रांत तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त राष्ट्र को एकात्म भाव से जोड़ने का आह्वान करता है। साथ ही इसका प्रभाव पंचइहलोक के सभी स्तरों पर दिखाई देता है। ग्रामीयलोक में यह ग्रामजागरण और लोकहित की प्रेरणा देता है; खंडीयलोक में सामाजिक समन्वय और क्षेत्रीय सहयोग का भाव जगाता है; प्रभागीयलोक में प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक संतुलन की चेतना उत्पन्न करता है; प्रांतीयलोक में सांस्कृतिक पहचान और उत्तरदायित्व को जागृत करता है और अंततः राष्ट्रीयलोक में सम्पूर्ण राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधकर राष्ट्रधर्म की स्थापना करता है।
इस प्रकार यह श्लोक पंचइहलोक की चेतना को राष्ट्रीय एकात्मता में रूपांतरित करने वाला वैदिक राष्ट्रमंत्र है। अंततः यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि हम केवल मात्र एक प्राणी नहीं हैं; हम राष्ट्रचेतना के वाहक हैं। जब प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प धारण करेगा कि —
“मैं स्वयं जाग्रत रहूँगा, दूसरों को भी जाग्रत करूँगा और राष्ट्रहित में अपना जीवन समर्पित करूँगा,” तभी इस वैदिक मंत्र की वास्तविक सार्थकता प्रकट होगी।
अतः “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” का यह वैदिक मंत्र “साहित्यिक सचेतना” के लिए भी अत्यंत प्रेरणास्रोत है। साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को जाग्रत करने वाली चेतना है। जब साहित्यकार अपनी लेखनी को लोकमंगल, राष्ट्रधर्म और मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित करता है, तब वह वास्तविक अर्थों में “पुरोहित” बन जाता है।
साहित्यिक सचेतना का उद्देश्य भी यही है कि शब्द केवल मनोरंजन का साधन न बनें, बल्कि समाज में विवेक, संवेदना, नैतिकता और एकात्मता का प्रकाश फैलाएँ। “वयं” की भावना साहित्य को व्यक्तिगत अभिव्यक्ति से ऊपर उठाकर समष्टिगत चेतना का स्वर बनाती है; “जागृयाम” साहित्यकार के भीतर आत्मबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और सत्य के प्रति जागरण उत्पन्न करता है और “पुरोहिताः” साहित्य को समाज के मार्गदर्शन का दिव्य माध्यम बना देता है।
जब कविता, कहानी, आलेख- चिंतन और संवाद राष्ट्रहित, लोककल्याण और आत्मजागरण की प्रेरणा देने लगते हैं, तभी साहित्यिक सचेतना अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होती है। इस प्रकार यह वैदिक मंत्र साहित्य को केवल सृजन नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के जागरण का तप, साधना और सांस्कृतिक यज्ञ बना देता है।
योगेश गहतोड़ी “यश”












