
राकेश आनन्दकर
झालमुड़ी खाकर हमने पत्नी से कहा –
प्रिय ! तुम्हें इस्तीफा देने में क्या हर्ज है ।
घर में आने वाली नई सरकार का
स्वागत करना तुम्हारा नैतिक फर्ज है ॥
पत्नी बोली , बंगाल का जादू किसी और पर चलाना ।
मेरे होते दूसरे से दिल क्या – नैन तक मत लड़ाना ॥
वरना देखो मुझे भी शपथ तोड़ना आता है ।
हर जगह बदलाव का फूल उगाना आता है ॥
मैं बच्चों और घर की जिम्मेदारी से बंधी हूं ।
वरना मुझे भी डूबती नाव से कूदना आता है ।
मुंह लटकाए देख पत्नी ने हमें लाड़ लड़ाया ।
असल सरकार का मतलब प्यार से समझाया ॥
बोली ,उसके तो कोई बीवी नहीं है इसलिए धरा है ।
तुम्हारा तो जाम अभी तक लबालब भरा है – – ॥
ये सुनते ही हमें सत्य का ज्ञान हो गया ।
मृगतृष्णा का भाव जगा था वो सो गया ॥
दोस्तों , हमें झालमुड़ी नहीं अब घर का पोहा भाया है ।
सच कहे नाश्ते में हमें रात्रि भोजन का आनंद आया है ॥












