
केवट प्रसंग।।
मागी नाव न केवटु आना,
कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।
चरण कमल रज कहुं सबु कहई ।
मानुष करनि मूरि कछु अहई।।
छुअत सिला भई नारि सु हाई।
पाहन तें न काठ कठिनाई।।
तर निउ मुनी घरिनी होइ जाई।
बा ट परइ मोरि नाव उड़ाई।।
एहिं प्रतिपालउं सबु परिवारू।
नहीं जानउं कछु अउर कबारू।।
जो प्रभु पार अवसि गा जह हू।
मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।
छंद,,
पद कमल धोई चढ़ाई नाव,
न नाथ उतराई चहों।
मोहि राम राउरि आन दसरथ,
सपथ सब साची कहों।
बरू तीर मारहुं लखनु पै
जब,
लगि न पाय पखारिहों।
तब लगी न तुलसीदास,
नाथ कृपालु पारू उतारि हों।।
सो,
सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेट अटपटे।
बिह से करुना ऐन, चितई जान की लखन तन।।
कृपा सिंधु बोले मुस्काई,
सोई करू जे हिं तव नाव न जाई।।
बेगि आनु जल पाय पाखरु,
हो त बिलंबु उतार रहि पारू।।
जासु नाम सुमिरत एक बारा,
उतर हिं नर भव सिंधु अपारा।
सोई कृपालु केवटहि निहोरा,
जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।
पद नख निरखी देवसरि हरषी,
सुनी प्रभु बचन मोह मति
करषी।।
केवट राम रजा यसु पावा,
पानि कठवता भरि लेई आवा।
अति आनंद उमगी अनुरागा,
चरण सरोज पखारन लागा।
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं,
एहि सम पुण्यपुंज कोउ नाहीं।।
दोहा,,
पद पखारि जलु पान करि,
आपु सहित परिवार।
पितर पारू करि प्रभु हि पुनि,
मुदित गयउ लेइ पार। ।
उतरि ठाढ भए सुरसरि रेता,
सीय रामु गुह लखन
समेता।
केवट उतरी दंडवत कीन्हा,
प्रभु हि सकुच एही नहिं कछु दीन्हा। ।
पिय हिय की सिय जान निहारी,
मनि मुदरी मन मुदित उतारी।
कहे उ कृपाल लेही उतराई,
केवट चरण गहे अकुलाई।।
नाथ आजु मैं काह न पावा,
मिटे दोष दुख दरिद दावा।।
बहुत काल मैं कीन्ही मजूरी,
आजु दीनह विधि बनि बनि भलिभूरी ।।
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें,
दीनदयाल अनुग्रह तोरें।
फिर ती बार मोहि जो देवा,
सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
दोहा,,
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियं
नहीं कछु के वट लेइ।
बिदा कीन्ह करूणायतन,
भगती विमल बरु देइ।।
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर ,मध्य प्रदेश












