
समय का पहिया गतिमान ,
कभी न रुकने पाए रे ।
बढ़ता रहता सदा वह आगे ,
पीछे लौट न आए रे ।।
पृथ्वी सदा है जो गोल गोल ,
वैसे ही घूमता जाए रे ।
गोल गोल ही घूमना नियति ,
वह घर घर घूम जाए रे ।।
कोई सवार होता समय पर ,
कोई समय से टकराए रे ।
कोई पहुॅंच जाए शीर्ष पर ,
कोई यों ही छूट जाए रे ।।
न चेन पुलिंग न ही भैकंप ,
न कहीं रुकने ही पाए रे ।
रहता जो सदा ही सतर्क ,
वही समय पकड़ पाए रे ।।
न झुकने न सीना तानने से ,
जन समय गीत गाए रे ।
जो बनता सदा जुझारू ,
वही समय जीत जाए रे ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












