Uncategorized
Trending

राधा-कृष्ण


(छंद मुक्त काव्य)

बंशी की मधुर तान में, ब्रज का राग समाया,
श्याम अधरों की मुस्कान में, प्रेम स्वयं इठलाया।
राधा की चितवन चंचल, जैसे चाँद झुका हो,
मन के हर कोने में, कृष्ण नाम ही बसा हो।

नील गगन सा वपु श्याम, पीताम्बर लहराए,
मोर मुकुट की छाया में, सृष्टि नृत्य रचाए।
राधा के नयनों में, अनंत सागर की गहराई,
हर श्वास में बसती, माधव की ही परछाई।

बंशी की धुन सुनकर, यमुना भी ठहर जाती,
वृंदावन की हर डाली, प्रेम गान सुनाती।
राधा का हर स्पंदन, कृष्ण में विलीन होता,
दो तन होकर भी उनका, एक ही प्राण संजोता।

आलोकित यह युगल रूप, जग को राह दिखाए,
भक्ति और शृंगार का, अद्भुत संगम कहलाए।
जहाँ राधा-कृष्ण बसें, वहाँ स्वयं ब्रह्म मुस्काए,
उनकी इस छवि में ही, हर हृदय शांति पाए॥


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *