
शेर अब सियार से डरने लगे है,
सियासत में सब रंग बदलने लगे है।
जो कभी कहते थे नास्तिक है हम,
वो आजकल प्रवचन कहने लगे हैं।
न कोई अब ईमान है न कायदा,
हर कोई ढूंढ़ने में लगा है फायदा।
बाजार चकाचौंध से भरपूर है,
हर तरफ है वायदा ही वायदा।
सब चाहत खोजने में लगे हैं,
एक दूसरे के पीछे लोग भगे है।
खुशियां पैसे से नहीं मिलती है,
मोह से माया तक सिर्फ दगे है।
इंकलाब की आंधी अब चली है,
सुना था प्यार की सकरी गली है।
लोग एक दूसरे को चोट पहुंचा रहे,
नीचा दिखाने की रीति अब चली है।
कवि संगम त्रिपाठी
जबलपुर मध्यप्रदेश












