
अति दोहन जब प्रकृति का, ऐसा हो परिणाम।
हुआ जानलेवा “विकल” जेठ दुपहरी घाम।।
बिना घोषणा के लगा, कर्फ्यू सा चहुँओर।
लोग बाग घर में घुसे, है गरमी का जोर।।
आम पना माठा दही, शरबत हो तरबूज।
शीतल जल भरपूर हो, हो सतुआ का यूज।।
कवि विष्णु बाजपेई “विकल”
(कटनी मध्य – प्रदे)












