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उस दल में गुल गुले खिलाते हैं

राजनीति का खेल चतुराई,
चालाकी भरा हुआ होता है,
इसे चतुर खिलाड़ी खेलते हैं,
मूर्ख लोग इसकी चर्चा करते हैं।

राजनीति की चर्चा में अपने
रिश्ते भी ख़राब कर लेते हैं,
पर नेता सारे अपने अपने
दल को श्रेष्ठ दल बताते हैं।

मौक़ा मिलते ही वे सत्ता की
ख़ातिर दल भी बदल लेते हैं,
आज इस दल में और वे कल
उस दल में गुल गुले खिलाते हैं।

अब तो परंपरा भी बदल गई,
वोट माँगने नेता नहीं आते हैं,
अपनी रैली और रोड शो में,
अपना ही भौकाल दिखाते हैं।

कोई वादे अब वे नहीं करते हैं,
जनता को हाथ नहीं जोड़ते हैं,
सारे राजनीति वाले सबसे बड़े
नेता का नाम गुणगान करते हैं।

हम अपनी बात करें तो अब तक
कोई नेता, कार्यकर्ता नहीं आये,
दस हज़ार सैनिकों के घर हैं यहाँ,
प्रत्याशी वोट माँगने नहीं आये।

आदित्य इसके पहले के चुनाव में
हर दल की बैठकें यहाँ होती थीं,
जनता से उन नेताओं के दल के
क़समें वादों की बातें भी होती थीं।

डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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