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गृहस्थ एक तपोवन

पूज्य गुरुदेव ने कहा था- गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।
इस तपोवन को छोड़कर या अपनी जिम्मेदारियों से भागकर हम अपनी साधना को कभी सफ़ल नहीं बना सकते।
हमें मानव जन्म कई जन्मों के पुण्य कर्मो के फलस्वरूप प्राप्त होता है। इसे हमें परिवार और समाज कल्याण के लिए सन्मार्ग पर चलते हुए व्यतीत करना चाहिए।
इस जीवन में कई परेशानियाँ, दुख दर्द, विषम परिस्थितियों, भावनात्मक आघात जैसी कई पीड़ाओ को झेलना पड़ता है।
हमारे जीवन में जो भी घटित होता है वह हमारे पूर्व जन्मों के कर्मो का ही प्रतिफल होता है।
जिसे हम प्रारब्ध कहते हैं।
लेकिन हम अपने वर्तमान जीवन में अच्छे कार्य करके एवम ईश्वर की साधना से जुड़कर अपने जीवन को सुंदर और सफल बना सकते हैं।
जब हम गृहस्थी को सुव्यवस्थित रख चलाने का प्रयास करते हैं तब समझ आता है कि इस तपोवन में कितनी साधना करनी पड़ती है। गुरुदेव का यह कथन तब समझ में आता है। जिसने इस तपोवन की साधना में सफलता प्राप्त कर ली अर्थात अपने परिवार को आध्यात्मिक वातावरण दे दिया ,समझो वह इस रंगमंच पर अपनी भूमिका भली भाँति निभाने में सफ़ल हो गया, साथ ही सतयुग के निर्माण में प्रतिभागी भी बन गया।

रचनाकार-

श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी ( म प्र)

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