
बिन पानी सहरा प्यासा है, ये कैसी प्यास पुरानी है,
बचपन की अनबूझ पहेली, सुलझे कहाँ ये पानी है।।
आँगन की दीवारें चटकीं, सूनेपन की दस्तक है,
उम्मीदों के सूखे नद में, बस यादों की हस्तक है।।
तपती राहें, शोले जैसी, तलवों को झुलसाती हैं,
अधजले पाँवों की नीयत, अब तो डगमगाती है।।
थक कर चूर हुए हैं जज़्बे, धूप बड़ी बेदर्दी है,
लाल रेत की इस दुनिया में, रूह भी अब तो ज़र्दी है।।
नदी सहारे नापती राहें, मृगतृष्णा का घेरा है,
तपतपाती इस दुपहरी में, हर सू घना अंधेरा है।।
आँखों की नमी भी सूखी, पत्थर सी अब लगती है,
ख्वाबों की कच्ची क्यारी में, आग सदा ही जगती है।।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश












